‘ईद की रात’ शीर्षक उपन्यास, समाज को एक नई रौशनी देनेवाला उपन्यास है| ऐसा मैं दावे के साथ नहीं कह सकती, पर समाज की कुछ कुरीतियाँ, तथा रुढ़िवादियों पर चोट अवश्य है| हम जिसके साथ जिंदगी के सफ़र पर निकलने जा रहे हैं| उसे बिना देखे, आजमाए सफ़र का साथी चुन लेना, किसी भी तरह युक्तिसंगत नहीं होगा| माना कि पति-पत्नी, एक दूसरे का पूरक है| एक मस्तिष्क, तो दूसरा ह्रदय है| मस्तिष्क और ह्रदय एक दूसरे का पूरक होकर भी एक ही पथ से चलेंगे, ऐसा नहीं होता है|
माना कि जीवन के निश्चित बिन्दुओं को जोड़ने का कार्य हमारा मस्तिष्क करता है, पर इस क्रम से बनी परिधि में सजीवता के रंग भरने की क्षमता ह्रदय में ही संभव है|
‘ईद की रात’ मेरे उपन्यास के ग्यारहवें उत्थान का परिचायक है| इसमें उपन्यास का मुख्य नायक और नायिका, दोनों ही निम्न मध्यम श्रेणी परिवार से हैं| पहली मुलाक़ात में ही दोनों मन ही मन एक दूसरे पर अपनी जान छिड़कते हैं| दोनों के ही अन्दर युवा उमंगों और मचलते अरमानों के ढेव, सामान रूप से उठते हैं| पर हमारी पुरातन रूढ़ि-रीतियों तथा मध्यकाल से ही चली आ रही हमारी सामाजिक व्यवस्थाएं, दोनों के रास्ते अलग कर देते हैं| जिससे मुझे बड़ी पीड़ा हुई| दोनों के व्यक्तिगत सुख-दुखों एवं मानसिक ऊहापोहों को नवीण बोध की धरातल पर उठाने के साथ ही, जग-जीवन से भी नवीण बोध के धरातल पर उठाने के साथ, ही जग-जीवन से भी नवीण रूप से सम्बन्ध स्थापित करने की आकांक्षा मुझे ‘ईद की रात ‘ लिखने के लिए प्रेरित करने लगी थी| मैं अपने अनुभवों की आँच पर तपकर, अपने मन को नवीण रूप से, नवीण विश्वासों में ढालना चाहती थी| यह उपन्यास, ’ईद की रात’, इसी का परिचायक है|