संवेदना भी संवेदनशील को तभी ज़िन्दा रख पाती हैं जब बड़े हो रहे मन और सख्त हो रहे शरीर के मध्य मासूमियत से भरी मुस्कान जिंदा हो ।
आपके मुस्कान को ज़िन्दा रखने के लिए मेरे कलम की नींब ने भर सक प्रयास किया है फिर भी आपकी मुस्कान को मेरे व्याकरण और वर्णित अशुद्धि आपको किसी भी रूप में ठेस पहुँचाई हो तो मैं तहे दिल से क्षमा-प्राथी हूँ ।