कमीने दोस्त देश के उन करोड़ों छात्रों की कहानी है जिनके माता-पिता अपने बच्चों की छुपी प्रतिभा का आकलन नही कर पाते और अपने सपनों को पूरा करने के लिए उन पर दबाव डालते हैं। कई बार हताश होकर उन्हे अपने हाल पर छोड़ देते हैं। यह कहानी एक ऐसे छात्र की कहानी है जिसे बचपन मे उसके शिक्षक पिता ने "मंदबुद्धि " का तमगा दे दिया था क्योकि वह आठ साल का होने के बावजूद भी स्कूल नही जाता था पर उसकी माँ को पूरा भरोसा था कि उसका बेटा जरूर पढ़ेगा और एक दिन अपने पिता से भी आगे जाकर प्रोफेसर बनेगा| माँ के भरोसे और प्यार ने बच्चे के अंदर उत्साह भर दिया और वह पूरी सिद्दत के साथ लक्ष्य को हासिल करने मे जुट गया | यह कहानी कुछ ऐसे ही छात्रों की कहानी है जो बनारस हिंदू युनिवर्सिटी मे साथ साथ पढ़े और अपने मुकाम पर पहुंच गए। इस उपन्यास मे छात्र जीवन मे आने वाली चुनौतियों, लक्ष्य हासिल करने की जिद, संवेदनाओं, जीवन के उतार-चढ़ाव,भटकाव व आपसी प्रेम का सजीव चित्रण है। यह कहानी छात्रों के लिए प्रेरणा श्रोत है।
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