मरीचिका तो अंतत: मरीचिका ही होती है, चाहे किसी भी वस्तु के प्रति हो। फिर इसका कोई अंत भी तो नहीं होता। दौड़ता दौड़ता इंसान थक हार कर बैठ जाता है। राधिका की भी कुछ ऎसी ही अवस्था थी। उस की भी हर आस समय के साथ साथ टूटती चली जा रही थी।
"माधव ! मेरी बात ध्यान से सुनो। मैं आपको अपने जीवन की एक सब से बड़ी सच्चाई बताने जा रही हूँ।” क्षणभर चुप रहने के पश्चात राधिका ने कहना आरम्भ किया, "यह सच है माधव कि मैं आपको बहुत ही अधिक प्यार करती हूँ। जिस दिन मैं पहली बार आपसे मिली थी, तब से ही मैं आपको चाहने लगी थी, लेकिन जिस दिन दुर्घटना मैं घायल हो गई थी और आपने मुझे अपना रक्त दिया था, तब से मानों मैंने अपना सर्वस्व ही आपके नाम कर दिया।
प्यार का यह भी कैसा दीवानापन है कि राधिका अभी भी सबकी नज़रों से बचती हुई बालकनी में आकर सामने गेट की और ही निहार रही थी। यहां पर कम से कम वह तो नहीं ही था, जिसे वह अपनों परायों की भीड़ में ढूँढने का प्रयास कर रही थी।