“माँझी, नैया ढूंढे किनारा”, यह उपन्यास रिश्ते के अनेक दिशाओं में, फैलने वाले प्रकाश की तरह, एक बहु संकेतिक उपन्यास है|नीता अपनी मोहब्बत को, आराधना की वेदी पर, रंजीत बाबू के लिए न्योछावर करने के लिए आतुर रहती है| उसकी हर साँस, मन्दिर की आरती की तरह अपने चहेते (रंजीत बाबू) पर समर्पित है| बावजूद उसे अपने मोहब्बत की बाँहों में रहने की आकांक्षी नहीं है| वह तो अपने असंख्य बन्धनों के बीच रहकर अपने मोहब्बत का स्वाद चखना चाहती है|
यह जानते हुए भी कि, वह किसी की पत्नी है, उसका प्यार विष्णुदेव जी हैं| उनके जीते जी, पर पुरुष की स्मृति भी अपने दिल में लाना पाप है, निंदनीय है|एक सच्ची आर्य नारी ऐसा कभी नहीं कर सकती, क्योंकि शादी के बाद प्रेम का अर्थ है, पति प्रेम!
पर नीता का मानना है, जब तक एक दूसरे के ह्रदय पर अधिकार नहीं, वैसा प्रेम जीवन-भार स्वरुप है| प्रेम में अगर प्रेम को खींचने की शक्ति नहीं है, तब यह एकतरफा प्रेम कैसा? प्रेम ईश्वरीय प्रेरणा है, इश्वरी संदेश है| प्रेम के संसार में आदमी बनाई सामाजिक व्यवस्थाओं का कोई मूल्य नहीं है| विवाह समाज के संगठन कि, केवल एक आयोजना है|