क्या हर प्रेम का अर्थ साथ होना ही होता है?
रोनित (राम) और सीता—दो अलग-अलग संसारों में जीते हुए दो संवेदनशील मन।
एक शिकायत से शुरू हुआ संवाद कब आत्मिक निकटता में बदल जाता है, यह उन्हें भी पता नहीं चलता।
दूरी है, जिम्मेदारियाँ हैं, समाज की सीमाएँ हैं—
फिर भी एक ऐसा भाव है, जो बिना अधिकार माँगे, बिना वादों के, चुपचाप जीवित रहता है।
यह उपन्यास उस प्रेम की कहानी है
जो मिलन से अधिक समझ में विश्वास करता है,
जो पाने से पहले सम्मान करना सिखाता है,
और जो अंत में एक कठिन प्रश्न छोड़ जाता है—
क्या सच्चा प्रेम वही है जो साथ रहे,
या वही जो दूर रहकर भी किसी की भलाई चाहे?
यह कहानी सिर्फ़ प्रेम की नहीं,
मनुष्य बने रहने की एक शांत, गहरी यात्रा है।
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