जिस देश का अतीत उपनी स्वर्णिम विभूति एवं संस्कृति की गाथा गाते दैविक सम्पदा पर गौरवान्वित रहा उसकी अनवरत विकास की परम्परा में आसुरी प्रवृति और बौद्धिक अवनति से मानव विनाश की ओर बढ़ चला।
आज उसकी चिन्तन चातुरी ने दीनता को आमंत्रित की, शान्ति, प्रगति, प्रीति, शुचिता और समरसता खो दी, वीरों की कुर्वाणी से धरती दहल उठी तो विश्व की मानवता आतंकित और मूर्च्छित अपने रूडन को रोक नही पा रही।
गुलामी की गर्त ने "भारत दुर्दशा" पर साहित्यकारों और कवियों सेनानियों को स्वर प्रदान कर स्वतंत्रता के आहान का विगुल फूका तो आज इस अज्ञानता और स्वार्थ परता की धन घटा को दूर करने हेतु सिर्फ आवाज नहीं प्रयास की निवान्त आवश्यकता है। इसके लिए तो भूषण, कवि चन्द और दिनकर जैसा शौर्य भरा सम्वाद का ही उदघोष चाहिए। नयी पीढ़ी को अवसाद व्याग कर उठना और आगे बढ़ना चाहिए। यह भाव डा. जी. भक्त की शैक्षिक सोच, सेवा कार्य और देश प्रमम से उपजा विचार वैभव युवा मानस और छात्र छात्राओं के लिए समर्पित है।
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