“न हन्यते हन्यमाने शरीरे – अमरता का रहस्य” आधुनिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान के बीच की एक गहन और विचारोत्तेजक यात्रा है। यह पुस्तक डॉ. रवि की कहानी के माध्यम से अमरता की उस खोज को प्रस्तुत करती है, जो सिलिकॉन वैली की ए.आई. और बायोटेक प्रयोगशालाओं से शुरू होकर योग, उपनिषद और आत्म-बोध तक पहुँचती है। दीर्घायु विज्ञान, सेलुलर रीप्रोग्रामिंग और मानव ऑप्टिमाइज़ेशन जैसे विषयों के साथ-साथ, यह कथा पतंजलि के अष्टांग योग, ध्यान और चेतना की शाश्वत प्रकृति को सरल लेकिन गहरे रूप में उजागर करती है। अंततः पुस्तक इस उपनिषदीय सत्य की ओर ले जाती है कि सच्ची अमरता शरीर को बचाने में नहीं, बल्कि यह जान लेने में है कि आत्मा शरीर से परे है—“न हन्यते हन्यमाने शरीरे।” यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो जीवन, मृत्यु और चेतना के रहस्य को विज्ञान और अध्यात्म दोनों के दृष्टिकोण से समझना चाहते हैं।
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