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"It was a wonderful experience interacting with you and appreciate the way you have planned and executed the whole publication process within the agreed timelines.”
Subrat SaurabhAuthor of Kuch Woh PalDr. Ravindra Pastor is a quintessential Renaissance person, a visionary, a successful entrepreneur, a passionate photographer, an eloquent motivational speaker, and an outstandingly successful IAS officer who spearheaded numerous innovative and admirable models throughout his 36-year eventful career in government. Now he is all set to blend & crystallise his kaleidoscopic experiences, explorations, and experiments, garnished with spiritual wisdom that he gained through his life, which will take the readers on an amazing, nostalgic journey of folklores, mythology & legends.Read More...
Dr. Ravindra Pastor is a quintessential Renaissance person, a visionary, a successful entrepreneur, a passionate photographer, an eloquent motivational speaker, and an outstandingly successful IAS officer who spearheaded numerous innovative and admirable models throughout his 36-year eventful career in government. Now he is all set to blend & crystallise his kaleidoscopic experiences, explorations, and experiments, garnished with spiritual wisdom that he gained through his life, which will take the readers on an amazing, nostalgic journey of folklores, mythology & legends.
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*महासमर : अदृश्य युद्ध और भारत का उदय* एक सशक्त भू-राजनीतिक थ्रिलर और रणनीतिक फिक्शन है, जो आधुनिक विश्व में चल रहे उस अदृश्य युद्ध को उजागर करता है जो राष्ट्रों की दिशा और दशा तय कर
*महासमर : अदृश्य युद्ध और भारत का उदय* एक सशक्त भू-राजनीतिक थ्रिलर और रणनीतिक फिक्शन है, जो आधुनिक विश्व में चल रहे उस अदृश्य युद्ध को उजागर करता है जो राष्ट्रों की दिशा और दशा तय करता है। इक्कीसवीं सदी में युद्ध अब सीमाओं और हथियारों तक सीमित नहीं रहा; यह डेटा, मुद्रा, तकनीक, मनोविज्ञान और नैरेटिव के माध्यम से लड़ा जा रहा है। 2047 के अमृतकाल की पृष्ठभूमि में यह उपन्यास भारत के सामने खड़े उन खतरों को प्रस्तुत करता है, जहाँ वैश्विक ‘डीप स्टेट’ की शक्तियाँ सामाजिक असंतोष, साइबर स्पेस और सूचना युद्ध के ज़रिये उसकी संप्रभुता को चुनौती देती हैं। कहानी के केंद्र में अजीत का चरित्र है, जो चाणक्य की आधुनिक रणनीतिक चेतना का प्रतीक है और बिना युद्ध घोषणा के नए युग के नियमों से संघर्ष करता है। महासमर केवल एक राजनीतिक उपन्यास नहीं, बल्कि यह प्रश्न उठाता है कि क्या भारत भविष्य में केवल एक सुपरपावर बनेगा या अपने मूल्यों के साथ विश्वगुरु के रूप में उभरेगा। यह पुस्तक राजनीति, रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक विचारोत्तेजक कृति है।
*महासमर : अदृश्य युद्ध और भारत का उदय* एक सशक्त भू-राजनीतिक थ्रिलर और रणनीतिक फिक्शन है, जो आधुनिक विश्व में चल रहे उस अदृश्य युद्ध को उजागर करता है जो राष्ट्रों की दिशा और दशा तय कर
*महासमर : अदृश्य युद्ध और भारत का उदय* एक सशक्त भू-राजनीतिक थ्रिलर और रणनीतिक फिक्शन है, जो आधुनिक विश्व में चल रहे उस अदृश्य युद्ध को उजागर करता है जो राष्ट्रों की दिशा और दशा तय करता है। इक्कीसवीं सदी में युद्ध अब सीमाओं और हथियारों तक सीमित नहीं रहा; यह डेटा, मुद्रा, तकनीक, मनोविज्ञान और नैरेटिव के माध्यम से लड़ा जा रहा है। 2047 के अमृतकाल की पृष्ठभूमि में यह उपन्यास भारत के सामने खड़े उन खतरों को प्रस्तुत करता है, जहाँ वैश्विक ‘डीप स्टेट’ की शक्तियाँ सामाजिक असंतोष, साइबर स्पेस और सूचना युद्ध के ज़रिये उसकी संप्रभुता को चुनौती देती हैं। कहानी के केंद्र में अजीत का चरित्र है, जो चाणक्य की आधुनिक रणनीतिक चेतना का प्रतीक है और बिना युद्ध घोषणा के नए युग के नियमों से संघर्ष करता है। महासमर केवल एक राजनीतिक उपन्यास नहीं, बल्कि यह प्रश्न उठाता है कि क्या भारत भविष्य में केवल एक सुपरपावर बनेगा या अपने मूल्यों के साथ विश्वगुरु के रूप में उभरेगा। यह पुस्तक राजनीति, रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक विचारोत्तेजक कृति है।
शब्द शक्ति – लोक माता लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के जीवन, दर्शन और शासन-दृष्टि पर आधारित एक विचारप्रधान पुस्तक है, जो इतिहास को केवल घटनाओं के क्रम में नहीं, बल्कि चेतना और नीति क
शब्द शक्ति – लोक माता लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के जीवन, दर्शन और शासन-दृष्टि पर आधारित एक विचारप्रधान पुस्तक है, जो इतिहास को केवल घटनाओं के क्रम में नहीं, बल्कि चेतना और नीति के रूप में प्रस्तुत करती है। चोंडी गाँव की एक साधारण बालिका से लेकर मालवा की लोकमाता बनने तक की यात्रा में यह पुस्तक दिखाती है कि कैसे अहिल्याबाई ने व्यक्तिगत दुःख, सामाजिक रूढ़ियों और सत्ता की चुनौतियों को शब्द, सत्य और करुणा की शक्ति से रूपांतरित किया। सती प्रथा का अस्वीकार, न्याय में निष्पक्षता, अकाल में लोककल्याण, बुनकरों और कारीगरों का आर्थिक सशक्तिकरण तथा भारत भर में सांस्कृतिक पुनर्जागरण ये सभी प्रसंग उनके उस शासन दर्शन को उजागर करते हैं जिसमें राजा स्वयं को प्रजा का सेवक मानता है। यह पुस्तक सिद्ध करती है कि सच्ची शक्ति तलवार में नहीं, बल्कि नीति, शब्द और विवेक में होती है, और अहिल्याबाई होलकर केवल एक शासिका नहीं, बल्कि लोकचेतना की अमर प्रतीक हैं।
शब्द शक्ति – लोक माता लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के जीवन, दर्शन और शासन-दृष्टि पर आधारित एक विचारप्रधान पुस्तक है, जो इतिहास को केवल घटनाओं के क्रम में नहीं, बल्कि चेतना और नीति क
शब्द शक्ति – लोक माता लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के जीवन, दर्शन और शासन-दृष्टि पर आधारित एक विचारप्रधान पुस्तक है, जो इतिहास को केवल घटनाओं के क्रम में नहीं, बल्कि चेतना और नीति के रूप में प्रस्तुत करती है। चोंडी गाँव की एक साधारण बालिका से लेकर मालवा की लोकमाता बनने तक की यात्रा में यह पुस्तक दिखाती है कि कैसे अहिल्याबाई ने व्यक्तिगत दुःख, सामाजिक रूढ़ियों और सत्ता की चुनौतियों को शब्द, सत्य और करुणा की शक्ति से रूपांतरित किया। सती प्रथा का अस्वीकार, न्याय में निष्पक्षता, अकाल में लोककल्याण, बुनकरों और कारीगरों का आर्थिक सशक्तिकरण तथा भारत भर में सांस्कृतिक पुनर्जागरण ये सभी प्रसंग उनके उस शासन दर्शन को उजागर करते हैं जिसमें राजा स्वयं को प्रजा का सेवक मानता है। यह पुस्तक सिद्ध करती है कि सच्ची शक्ति तलवार में नहीं, बल्कि नीति, शब्द और विवेक में होती है, और अहिल्याबाई होलकर केवल एक शासिका नहीं, बल्कि लोकचेतना की अमर प्रतीक हैं।
गॉड मैन सिंड्रोम एक समकालीन राजनीतिक उपन्यास है जो सत्ता, अहंकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण की जटिल यात्रा को गहराई से चित्रित करता है। कथा एक करिश्माई और लोकप्रिय प्र
गॉड मैन सिंड्रोम एक समकालीन राजनीतिक उपन्यास है जो सत्ता, अहंकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण की जटिल यात्रा को गहराई से चित्रित करता है। कथा एक करिश्माई और लोकप्रिय प्रधानमंत्री के माध्यम से दिखाती है कि कैसे जन-समर्थन, मीडिया नैरेटिव और अत्याधुनिक प्रचार तंत्र मिलकर एक लोकतांत्रिक नेता को धीरे-धीरे व्यवस्था से ऊपर स्थापित कर देते हैं। यह उपन्यास ‘टीवी वाले भारत’ की चमकदार छवि और ‘ज़मीन वाले भारत’ की कठोर वास्तविकताओं बेरोज़गारी, ग्रामीण संकट और सामाजिक असमानता के बीच के गहरे विरोधाभास को उजागर करता है। सत्ता के ह्यूब्रेस, विरासत के नाम पर स्मारक-निर्माण, भावनात्मक राजनीति, मीडिया की भूमिका और नागरिक प्रतिरोध जैसे विषय इस कथा को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय और नैतिक बनाते हैं। God Man Syndrome एक चेतावनी भी है और एक प्रश्न भी, कि जब नागरिक चुप हो जाते हैं और सच शोर में दब जाता है, तब लोकतंत्र किस दिशा में बढ़ता है।
गॉड मैन सिंड्रोम एक समकालीन राजनीतिक उपन्यास है जो सत्ता, अहंकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण की जटिल यात्रा को गहराई से चित्रित करता है। कथा एक करिश्माई और लोकप्रिय प्र
गॉड मैन सिंड्रोम एक समकालीन राजनीतिक उपन्यास है जो सत्ता, अहंकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण की जटिल यात्रा को गहराई से चित्रित करता है। कथा एक करिश्माई और लोकप्रिय प्रधानमंत्री के माध्यम से दिखाती है कि कैसे जन-समर्थन, मीडिया नैरेटिव और अत्याधुनिक प्रचार तंत्र मिलकर एक लोकतांत्रिक नेता को धीरे-धीरे व्यवस्था से ऊपर स्थापित कर देते हैं। यह उपन्यास ‘टीवी वाले भारत’ की चमकदार छवि और ‘ज़मीन वाले भारत’ की कठोर वास्तविकताओं बेरोज़गारी, ग्रामीण संकट और सामाजिक असमानता के बीच के गहरे विरोधाभास को उजागर करता है। सत्ता के ह्यूब्रेस, विरासत के नाम पर स्मारक-निर्माण, भावनात्मक राजनीति, मीडिया की भूमिका और नागरिक प्रतिरोध जैसे विषय इस कथा को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय और नैतिक बनाते हैं। God Man Syndrome एक चेतावनी भी है और एक प्रश्न भी, कि जब नागरिक चुप हो जाते हैं और सच शोर में दब जाता है, तब लोकतंत्र किस दिशा में बढ़ता है।
“न हन्यते हन्यमाने शरीरे – अमरता का रहस्य” आधुनिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान के बीच की एक गहन और विचारोत्तेजक यात्रा है। यह पुस्तक डॉ. रवि की कहानी के माध्य
“न हन्यते हन्यमाने शरीरे – अमरता का रहस्य” आधुनिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान के बीच की एक गहन और विचारोत्तेजक यात्रा है। यह पुस्तक डॉ. रवि की कहानी के माध्यम से अमरता की उस खोज को प्रस्तुत करती है, जो सिलिकॉन वैली की ए.आई. और बायोटेक प्रयोगशालाओं से शुरू होकर योग, उपनिषद और आत्म-बोध तक पहुँचती है। दीर्घायु विज्ञान, सेलुलर रीप्रोग्रामिंग और मानव ऑप्टिमाइज़ेशन जैसे विषयों के साथ-साथ, यह कथा पतंजलि के अष्टांग योग, ध्यान और चेतना की शाश्वत प्रकृति को सरल लेकिन गहरे रूप में उजागर करती है। अंततः पुस्तक इस उपनिषदीय सत्य की ओर ले जाती है कि सच्ची अमरता शरीर को बचाने में नहीं, बल्कि यह जान लेने में है कि आत्मा शरीर से परे है—“न हन्यते हन्यमाने शरीरे।” यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो जीवन, मृत्यु और चेतना के रहस्य को विज्ञान और अध्यात्म दोनों के दृष्टिकोण से समझना चाहते हैं।
“न हन्यते हन्यमाने शरीरे – अमरता का रहस्य” आधुनिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान के बीच की एक गहन और विचारोत्तेजक यात्रा है। यह पुस्तक डॉ. रवि की कहानी के माध्य
“न हन्यते हन्यमाने शरीरे – अमरता का रहस्य” आधुनिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान के बीच की एक गहन और विचारोत्तेजक यात्रा है। यह पुस्तक डॉ. रवि की कहानी के माध्यम से अमरता की उस खोज को प्रस्तुत करती है, जो सिलिकॉन वैली की ए.आई. और बायोटेक प्रयोगशालाओं से शुरू होकर योग, उपनिषद और आत्म-बोध तक पहुँचती है। दीर्घायु विज्ञान, सेलुलर रीप्रोग्रामिंग और मानव ऑप्टिमाइज़ेशन जैसे विषयों के साथ-साथ, यह कथा पतंजलि के अष्टांग योग, ध्यान और चेतना की शाश्वत प्रकृति को सरल लेकिन गहरे रूप में उजागर करती है। अंततः पुस्तक इस उपनिषदीय सत्य की ओर ले जाती है कि सच्ची अमरता शरीर को बचाने में नहीं, बल्कि यह जान लेने में है कि आत्मा शरीर से परे है—“न हन्यते हन्यमाने शरीरे।” यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो जीवन, मृत्यु और चेतना के रहस्य को विज्ञान और अध्यात्म दोनों के दृष्टिकोण से समझना चाहते हैं।
“त्वदीय पाद-पंकजम् — नमामि देवी नर्मदे / नर्मदे हर” एक आध्यात्मिक साहित्यिक उपन्यास है जो नर्मदा नदी की पावन परिक्रमा के माध्यम से भौतिक यात्रा के साथ-साथ गहन आत्मिक परिवर्
“त्वदीय पाद-पंकजम् — नमामि देवी नर्मदे / नर्मदे हर” एक आध्यात्मिक साहित्यिक उपन्यास है जो नर्मदा नदी की पावन परिक्रमा के माध्यम से भौतिक यात्रा के साथ-साथ गहन आत्मिक परिवर्तन की कथा प्रस्तुत करता है। अमरकंटक, ओंकारेश्वर, महेश्वर और भरूच जैसे पवित्र स्थल केवल भौगोलिक पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि जीवंत और रूपांतरित करने वाली चेतन उपस्थिति के रूप में उभरते हैं। रेवा और सोनभद्र की प्राचीन कथा से गुंथा यह कथानक प्रेम, अहंकार, आत्म-समर्पण और आत्मबोध जैसे शाश्वत मानवीय भावों को प्रतिबिंबित करता है। रवि और अन्या की यात्रा के माध्यम से यह उपन्यास भौतिक आसक्तियों से मुक्ति, चिरंतन प्रेम की खोज तथा लोक-संस्कृति और अद्वैत दर्शन के माध्यम से व्यक्त शांत और गहन अनुभूतियों को उजागर करता है। अपने मूल में यह कृति जीवन को एक सतत परिक्रमा के रूप में प्रस्तुत करती है, जहाँ अंतिम विसर्जन मुक्ति, पूर्णता और आध्यात्मिक जागरण का सशक्त प्रतीक बन जाता है।
“त्वदीय पाद-पंकजम् — नमामि देवी नर्मदे / नर्मदे हर” एक आध्यात्मिक साहित्यिक उपन्यास है जो नर्मदा नदी की पावन परिक्रमा के माध्यम से भौतिक यात्रा के साथ-साथ गहन आत्मिक परिवर्
“त्वदीय पाद-पंकजम् — नमामि देवी नर्मदे / नर्मदे हर” एक आध्यात्मिक साहित्यिक उपन्यास है जो नर्मदा नदी की पावन परिक्रमा के माध्यम से भौतिक यात्रा के साथ-साथ गहन आत्मिक परिवर्तन की कथा प्रस्तुत करता है। अमरकंटक, ओंकारेश्वर, महेश्वर और भरूच जैसे पवित्र स्थल केवल भौगोलिक पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि जीवंत और रूपांतरित करने वाली चेतन उपस्थिति के रूप में उभरते हैं। रेवा और सोनभद्र की प्राचीन कथा से गुंथा यह कथानक प्रेम, अहंकार, आत्म-समर्पण और आत्मबोध जैसे शाश्वत मानवीय भावों को प्रतिबिंबित करता है। रवि और अन्या की यात्रा के माध्यम से यह उपन्यास भौतिक आसक्तियों से मुक्ति, चिरंतन प्रेम की खोज तथा लोक-संस्कृति और अद्वैत दर्शन के माध्यम से व्यक्त शांत और गहन अनुभूतियों को उजागर करता है। अपने मूल में यह कृति जीवन को एक सतत परिक्रमा के रूप में प्रस्तुत करती है, जहाँ अंतिम विसर्जन मुक्ति, पूर्णता और आध्यात्मिक जागरण का सशक्त प्रतीक बन जाता है।
अर्द्धनारीश्वर: चेतना का रहस्य एक ऐसी कहानी है जहाँ आधुनिक जेनेटिक साइंस और प्राचीन भारतीय ज्ञान एक साथ आते हैं। दिल्ली के एक्सपेरिमेंटल रिसर्च सेंटर में डॉ. रवि और डॉ. अन्या CRISPR
अर्द्धनारीश्वर: चेतना का रहस्य एक ऐसी कहानी है जहाँ आधुनिक जेनेटिक साइंस और प्राचीन भारतीय ज्ञान एक साथ आते हैं। दिल्ली के एक्सपेरिमेंटल रिसर्च सेंटर में डॉ. रवि और डॉ. अन्या CRISPR तकनीक, डिज़ाइनर जेनेटिक्स और मानव अमरता जैसे बड़े वैज्ञानिक लक्ष्यों पर काम करते हैं। लेकिन धीरे-धीरे रवि समझना शुरू करता है कि जीवन, चेतना और आत्मा जैसे गहरे सवालों के जवाब सिर्फ विज्ञान में नहीं मिलते।
सच्चाई की खोज उसे प्रयोगशाला से काशी तक ले जाती है। वहाँ एक शिव-तांत्रिक योगी उसे बताता है कि कैसे हर इंसान के DNA में शिव (चेतना) और शक्ति (ऊर्जा) का संतुलन छिपा है। यह अनुभव उसके भीतर एक नई जागृति पैदा करता है और “कॉन्शियस जीनोम प्रोजेक्ट” की शुरुआत होती है एक ऐसा प्रयास जो वैज्ञानिक सोच और आध्यात्मिक समझ को एक साथ लाने की कोशिश करता है।
उपन्यास यह सवाल उठाता है: क्या असली विकास शरीर को परिपूर्ण बनाने में है, या आत्मा को जागृत करने में? अर्द्धनारीश्वर पाठकों को उस दुनिया में ले जाता है जहाँ विज्ञान और आध्यात्मिकता एक दूसरे को पूरा करते हैं और एक नए, जाग्रत मानव के उदय की शुरुआत होती है।
अर्द्धनारीश्वर: चेतना का रहस्य एक ऐसी कहानी है जहाँ आधुनिक जेनेटिक साइंस और प्राचीन भारतीय ज्ञान एक साथ आते हैं। दिल्ली के एक्सपेरिमेंटल रिसर्च सेंटर में डॉ. रवि और डॉ. अन्या CRISPR
अर्द्धनारीश्वर: चेतना का रहस्य एक ऐसी कहानी है जहाँ आधुनिक जेनेटिक साइंस और प्राचीन भारतीय ज्ञान एक साथ आते हैं। दिल्ली के एक्सपेरिमेंटल रिसर्च सेंटर में डॉ. रवि और डॉ. अन्या CRISPR तकनीक, डिज़ाइनर जेनेटिक्स और मानव अमरता जैसे बड़े वैज्ञानिक लक्ष्यों पर काम करते हैं। लेकिन धीरे-धीरे रवि समझना शुरू करता है कि जीवन, चेतना और आत्मा जैसे गहरे सवालों के जवाब सिर्फ विज्ञान में नहीं मिलते।
सच्चाई की खोज उसे प्रयोगशाला से काशी तक ले जाती है। वहाँ एक शिव-तांत्रिक योगी उसे बताता है कि कैसे हर इंसान के DNA में शिव (चेतना) और शक्ति (ऊर्जा) का संतुलन छिपा है। यह अनुभव उसके भीतर एक नई जागृति पैदा करता है और “कॉन्शियस जीनोम प्रोजेक्ट” की शुरुआत होती है एक ऐसा प्रयास जो वैज्ञानिक सोच और आध्यात्मिक समझ को एक साथ लाने की कोशिश करता है।
उपन्यास यह सवाल उठाता है: क्या असली विकास शरीर को परिपूर्ण बनाने में है, या आत्मा को जागृत करने में? अर्द्धनारीश्वर पाठकों को उस दुनिया में ले जाता है जहाँ विज्ञान और आध्यात्मिकता एक दूसरे को पूरा करते हैं और एक नए, जाग्रत मानव के उदय की शुरुआत होती है।
“मोक्ष: मुक्ति का मार्ग” जीवन, मृत्यु, पुनर्जन्म और मुक्ति की शाश्वत खोज पर आधारित एक गहन आध्यात्मिक उपन्यास है। यह कहानी तीन पीढ़ियों की समानांतर यात्राओं के माध्यम से बतात
“मोक्ष: मुक्ति का मार्ग” जीवन, मृत्यु, पुनर्जन्म और मुक्ति की शाश्वत खोज पर आधारित एक गहन आध्यात्मिक उपन्यास है। यह कहानी तीन पीढ़ियों की समानांतर यात्राओं के माध्यम से बताती है कि मोक्ष कोई दूर का लक्ष्य नहीं, बल्कि हर मनुष्य की आंतरिक चेतना में घटने वाली एक परिवर्तनकारी अनुभूति है। पुस्तक में भगवद्गीता का निष्काम कर्मयोग, अद्वैत वेदांत, पतंजलि योगसूत्र का कैवल्य, शिव-तंत्र का जीवन-मुक्ति दर्शन, बुद्ध का निर्वाण और तिब्बती बारदो जैसी दार्शनिक धारणाओं का सुंदर समन्वय है।
डॉ. रवीन्द्र पस्तोर इस कृति में यह सिद्ध करते हैं कि मोक्ष न शरीर के अंत में मिलने वाला पुरस्कार है और न किसी चमत्कार का परिणाम यह प्रेम, जागरूकता और आत्म-बोध के माध्यम से हर क्षण में जिया जा सकने वाला अनुभव है। जीवन के गहरे प्रश्नों “मैं कौन हूँ? मैं यहाँ क्यों हूँ?” का उत्तर खोजने वाले हर पाठक के लिए यह उपन्यास एक दिशा-दर्शक और आत्मिक मार्गदर्शक साबित होगा।
“मोक्ष: मुक्ति का मार्ग” जीवन, मृत्यु, पुनर्जन्म और मुक्ति की शाश्वत खोज पर आधारित एक गहन आध्यात्मिक उपन्यास है। यह कहानी तीन पीढ़ियों की समानांतर यात्राओं के माध्यम से बतात
“मोक्ष: मुक्ति का मार्ग” जीवन, मृत्यु, पुनर्जन्म और मुक्ति की शाश्वत खोज पर आधारित एक गहन आध्यात्मिक उपन्यास है। यह कहानी तीन पीढ़ियों की समानांतर यात्राओं के माध्यम से बताती है कि मोक्ष कोई दूर का लक्ष्य नहीं, बल्कि हर मनुष्य की आंतरिक चेतना में घटने वाली एक परिवर्तनकारी अनुभूति है। पुस्तक में भगवद्गीता का निष्काम कर्मयोग, अद्वैत वेदांत, पतंजलि योगसूत्र का कैवल्य, शिव-तंत्र का जीवन-मुक्ति दर्शन, बुद्ध का निर्वाण और तिब्बती बारदो जैसी दार्शनिक धारणाओं का सुंदर समन्वय है।
डॉ. रवीन्द्र पस्तोर इस कृति में यह सिद्ध करते हैं कि मोक्ष न शरीर के अंत में मिलने वाला पुरस्कार है और न किसी चमत्कार का परिणाम यह प्रेम, जागरूकता और आत्म-बोध के माध्यम से हर क्षण में जिया जा सकने वाला अनुभव है। जीवन के गहरे प्रश्नों “मैं कौन हूँ? मैं यहाँ क्यों हूँ?” का उत्तर खोजने वाले हर पाठक के लिए यह उपन्यास एक दिशा-दर्शक और आत्मिक मार्गदर्शक साबित होगा।
“गजवा-ए-हिंद बनाम भगवा-ए-हिंद” भारत के वैचारिक, धार्मिक और भू-राजनीतिक संघर्षों का एक गहन और रोमांचक उपन्यास है—एक ऐसी कहानी जो सरहदों या सेनाओं से नहीं, बल्कि मानव मन, भ्रम औ
“गजवा-ए-हिंद बनाम भगवा-ए-हिंद” भारत के वैचारिक, धार्मिक और भू-राजनीतिक संघर्षों का एक गहन और रोमांचक उपन्यास है—एक ऐसी कहानी जो सरहदों या सेनाओं से नहीं, बल्कि मानव मन, भ्रम और सत्ता की छिपी आग से लड़ी जाती है।
यह उपन्यास बताता है कि भारत पर सबसे बड़ा ख़तरा बाहरी आक्रमण नहीं, बल्कि अदृश्य विचारों का युद्ध है जहाँ धर्म कभी हथियार बनता है और कभी आश्रय।
कहानी की धुरी है डॉ. अविनाश राय, NIA के प्रमुख, जो “गजवा-ए-हिंद” नामक एक वैश्विक साजिश का सामना कर रहे हैं।
कट्टरपंथी संगठनों का उद्देश्य भारत को बंदूक से नहीं, बल्कि वैचारिक विभाजन, जनसांख्यिकीय युद्ध, व्हाइट-कॉलर टेरर, और मनोवैज्ञानिक प्रोपेगेंडा से अस्थिर करना है।
उधर, भारतीय दर्शन धर्म-शक्ति, कर्म-नीति और काल-चक्र इस लड़ाई का वास्तविक हथियार बनते हैं।
कहानी दिल्ली के तहखानों से इस्तांबुल की गलियों और संयुक्त राष्ट्र तक जाती है, जहाँ सत्य, न्याय और भारतीय सभ्यता की आत्मा की अंतिम परीक्षा होती है।
यह उपन्यास न किसी “गजवा” का समर्थन करता है, न किसी “भगवा” का प्रचार।
यह उन तीन अदृश्य शक्तियों को उजागर करता है जो आज भारत की आत्मा को खींचतान में झोंक रही हैं— विश्वास की आग, भ्रम की आग, और सत्ता की आग।
यह पुस्तक आतंकवाद, जासूसी और भू-राजनीतिक संघर्ष से आगे बढ़कर, भारत की उस शाश्वत चेतना की कहानी है जिसने हजारों वर्षों से हर आक्रमण को झेला और फिर भी जीवित रही।
“गजवा-ए-हिंद बनाम भगवा-ए-हिंद” एक चेतावनी भी है और एक आस्था भी— कि धर्म का वास्तविक युद्ध बाहर नहीं, भीतर लड़ना होता है।
यह हर उस पाठक के लिए है जो सत्य, न्याय, आधुनिक भारत की चुनौतियों, धार्मिक राजनीति, और सभ्यता की जड़ों को समझना चाहता है।
“गजवा-ए-हिंद बनाम भगवा-ए-हिंद” भारत के वैचारिक, धार्मिक और भू-राजनीतिक संघर्षों का एक गहन और रोमांचक उपन्यास है—एक ऐसी कहानी जो सरहदों या सेनाओं से नहीं, बल्कि मानव मन, भ्रम औ
“गजवा-ए-हिंद बनाम भगवा-ए-हिंद” भारत के वैचारिक, धार्मिक और भू-राजनीतिक संघर्षों का एक गहन और रोमांचक उपन्यास है—एक ऐसी कहानी जो सरहदों या सेनाओं से नहीं, बल्कि मानव मन, भ्रम और सत्ता की छिपी आग से लड़ी जाती है।
यह उपन्यास बताता है कि भारत पर सबसे बड़ा ख़तरा बाहरी आक्रमण नहीं, बल्कि अदृश्य विचारों का युद्ध है जहाँ धर्म कभी हथियार बनता है और कभी आश्रय।
कहानी की धुरी है डॉ. अविनाश राय, NIA के प्रमुख, जो “गजवा-ए-हिंद” नामक एक वैश्विक साजिश का सामना कर रहे हैं।
कट्टरपंथी संगठनों का उद्देश्य भारत को बंदूक से नहीं, बल्कि वैचारिक विभाजन, जनसांख्यिकीय युद्ध, व्हाइट-कॉलर टेरर, और मनोवैज्ञानिक प्रोपेगेंडा से अस्थिर करना है।
उधर, भारतीय दर्शन धर्म-शक्ति, कर्म-नीति और काल-चक्र इस लड़ाई का वास्तविक हथियार बनते हैं।
कहानी दिल्ली के तहखानों से इस्तांबुल की गलियों और संयुक्त राष्ट्र तक जाती है, जहाँ सत्य, न्याय और भारतीय सभ्यता की आत्मा की अंतिम परीक्षा होती है।
यह उपन्यास न किसी “गजवा” का समर्थन करता है, न किसी “भगवा” का प्रचार।
यह उन तीन अदृश्य शक्तियों को उजागर करता है जो आज भारत की आत्मा को खींचतान में झोंक रही हैं— विश्वास की आग, भ्रम की आग, और सत्ता की आग।
यह पुस्तक आतंकवाद, जासूसी और भू-राजनीतिक संघर्ष से आगे बढ़कर, भारत की उस शाश्वत चेतना की कहानी है जिसने हजारों वर्षों से हर आक्रमण को झेला और फिर भी जीवित रही।
“गजवा-ए-हिंद बनाम भगवा-ए-हिंद” एक चेतावनी भी है और एक आस्था भी— कि धर्म का वास्तविक युद्ध बाहर नहीं, भीतर लड़ना होता है।
यह हर उस पाठक के लिए है जो सत्य, न्याय, आधुनिक भारत की चुनौतियों, धार्मिक राजनीति, और सभ्यता की जड़ों को समझना चाहता है।
‘द डायमंड रश हीरों की खोज’ बुंदेलखंड की उस पथरीली, प्यासी और गौरवशाली भूमि की कहानी है, जहाँ मिट्टी के नीचे दौलत का वादा है, और ज़मीन के ऊपर संघर्ष का साया।
यह उपन्यास केवल
‘द डायमंड रश हीरों की खोज’ बुंदेलखंड की उस पथरीली, प्यासी और गौरवशाली भूमि की कहानी है, जहाँ मिट्टी के नीचे दौलत का वादा है, और ज़मीन के ऊपर संघर्ष का साया।
यह उपन्यास केवल हीरों की खोज का वृत्तांत नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन की यात्रा है जहाँ सत्ता, जाति और राजनीति के बीच प्रेम, करुणा और एकजुटता अपनी नई परिभाषा रचते हैं।
कहानी पन्ना की धरती से शुरू होती है महाराजा छत्रसाल की वीरता, महामति प्राणनाथ का आशीर्वाद, और फिर सदियों बाद दो राजनीतिक परिवारों राव और सिंह के बीच जन्मी अदावत, जो एक नए युग की त्रासदी और पुनर्जन्म दोनों बनती है।
राजनीतिक वैमनस्य, सामाजिक रूढ़ियाँ और लालच के बीच एक निषिद्ध प्रेम जन्म लेता है, जो इस भूमि की दिशा बदल देता है। जब सत्ता के खेल थक जाते हैं, तब यह कहानी दिखाती है कि बुंदेलखंड की असली ताकत उसके हीरों में नहीं, बल्कि उसके लोगों के जज़्बे और सहयोग में है।
डॉ. रविन्द्र पस्तोर का यह उपन्यास इतिहास, राजनीति और मानवीय संवेदना का अद्भुत संगम है जहाँ ‘हीरे की खोज’ अंततः ‘आत्मा की खोज’ बन जाती है।
‘द डायमंड रश हीरों की खोज’ बुंदेलखंड की उस पथरीली, प्यासी और गौरवशाली भूमि की कहानी है, जहाँ मिट्टी के नीचे दौलत का वादा है, और ज़मीन के ऊपर संघर्ष का साया।
यह उपन्यास केवल
‘द डायमंड रश हीरों की खोज’ बुंदेलखंड की उस पथरीली, प्यासी और गौरवशाली भूमि की कहानी है, जहाँ मिट्टी के नीचे दौलत का वादा है, और ज़मीन के ऊपर संघर्ष का साया।
यह उपन्यास केवल हीरों की खोज का वृत्तांत नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन की यात्रा है जहाँ सत्ता, जाति और राजनीति के बीच प्रेम, करुणा और एकजुटता अपनी नई परिभाषा रचते हैं।
कहानी पन्ना की धरती से शुरू होती है महाराजा छत्रसाल की वीरता, महामति प्राणनाथ का आशीर्वाद, और फिर सदियों बाद दो राजनीतिक परिवारों राव और सिंह के बीच जन्मी अदावत, जो एक नए युग की त्रासदी और पुनर्जन्म दोनों बनती है।
राजनीतिक वैमनस्य, सामाजिक रूढ़ियाँ और लालच के बीच एक निषिद्ध प्रेम जन्म लेता है, जो इस भूमि की दिशा बदल देता है। जब सत्ता के खेल थक जाते हैं, तब यह कहानी दिखाती है कि बुंदेलखंड की असली ताकत उसके हीरों में नहीं, बल्कि उसके लोगों के जज़्बे और सहयोग में है।
डॉ. रविन्द्र पस्तोर का यह उपन्यास इतिहास, राजनीति और मानवीय संवेदना का अद्भुत संगम है जहाँ ‘हीरे की खोज’ अंततः ‘आत्मा की खोज’ बन जाती है।
“अश्वत्थामा सिंड्रोम” सिर्फ एक पौराणिक कथा नहीं यह आधुनिक मनुष्य की मनोवैज्ञानिक यात्रा है।
महाभारत का वह चिरंजीवी योद्धा, जिसके माथे पर जलता घाव एक श्राप बनकर रह गया, आज भ
“अश्वत्थामा सिंड्रोम” सिर्फ एक पौराणिक कथा नहीं यह आधुनिक मनुष्य की मनोवैज्ञानिक यात्रा है।
महाभारत का वह चिरंजीवी योद्धा, जिसके माथे पर जलता घाव एक श्राप बनकर रह गया, आज भी हमारे भीतर जीवित है हमारी स्मृतियों, रोष, पछतावे और आंतरिक संघर्षों में।
यह पुस्तक एक दर्पण है जो दिखाती है कि कैसे अतीत की पीड़ा, प्रतिशोध, अपराधबोध और तुलना का विष हमें भीतर से खाता रहता है।
हम जीवित हैं, पर मुक्त नहीं… सांस लेते हैं, पर शांति खो चुके हैं… आगे बढ़ना चाहते हैं, पर स्मृतियों की बेड़ियों में जकड़े हैं।
क्या हम सभी कहीं न कहीं अश्वत्थामा की तरह अपने अदृश्य घावों के साथ नहीं जी रहे?
यह पुस्तक आपको आपके “आंतरिक कुरुक्षेत्र” में उतारती है जहाँ असली युद्ध बाहरी नहीं, मन के भीतर है।
“अश्वत्थामा सिंड्रोम” सिर्फ एक पौराणिक कथा नहीं यह आधुनिक मनुष्य की मनोवैज्ञानिक यात्रा है।
महाभारत का वह चिरंजीवी योद्धा, जिसके माथे पर जलता घाव एक श्राप बनकर रह गया, आज भ
“अश्वत्थामा सिंड्रोम” सिर्फ एक पौराणिक कथा नहीं यह आधुनिक मनुष्य की मनोवैज्ञानिक यात्रा है।
महाभारत का वह चिरंजीवी योद्धा, जिसके माथे पर जलता घाव एक श्राप बनकर रह गया, आज भी हमारे भीतर जीवित है हमारी स्मृतियों, रोष, पछतावे और आंतरिक संघर्षों में।
यह पुस्तक एक दर्पण है जो दिखाती है कि कैसे अतीत की पीड़ा, प्रतिशोध, अपराधबोध और तुलना का विष हमें भीतर से खाता रहता है।
हम जीवित हैं, पर मुक्त नहीं… सांस लेते हैं, पर शांति खो चुके हैं… आगे बढ़ना चाहते हैं, पर स्मृतियों की बेड़ियों में जकड़े हैं।
क्या हम सभी कहीं न कहीं अश्वत्थामा की तरह अपने अदृश्य घावों के साथ नहीं जी रहे?
यह पुस्तक आपको आपके “आंतरिक कुरुक्षेत्र” में उतारती है जहाँ असली युद्ध बाहरी नहीं, मन के भीतर है।
“बुद्धिमानी से कैरियर चुनें – व्यावहारिक मार्गदर्शिका” युवाओं, अभिभावकों और प्रोफेशनल्स के लिए एक ऐसी प्रेरक और प्रायोगिक पुस्तक है, जो करियर चयन को सोच-समझकर करने की कला
“बुद्धिमानी से कैरियर चुनें – व्यावहारिक मार्गदर्शिका” युवाओं, अभिभावकों और प्रोफेशनल्स के लिए एक ऐसी प्रेरक और प्रायोगिक पुस्तक है, जो करियर चयन को सोच-समझकर करने की कला सिखाती है।
डॉ. रविन्द्र पस्तोर के 70 वर्षों के अनुभव पर आधारित यह पुस्तक आत्म-विश्लेषण, सोच-समझकर निर्णय लेने, और Soft Skills विकसित करने के व्यावहारिक तरीक़े प्रस्तुत करती है।
यह मार्गदर्शिका आपको अपनी रुचियों, मूल्यों और क्षमताओं को पहचानकर सही करियर दिशा चुनने में सहायता करती है — बिना भीड़-भाड़ वाले रास्ते में फंसने के। स्पष्ट प्रश्न, उपयोगी अभ्यास और वास्तविक जीवन सुझावों के साथ यह पुस्तक हर युवा को आत्मविश्वास, स्पष्टता और सफलता की राह दिखाती है।
“बुद्धिमानी से कैरियर चुनें – व्यावहारिक मार्गदर्शिका” युवाओं, अभिभावकों और प्रोफेशनल्स के लिए एक ऐसी प्रेरक और प्रायोगिक पुस्तक है, जो करियर चयन को सोच-समझकर करने की कला
“बुद्धिमानी से कैरियर चुनें – व्यावहारिक मार्गदर्शिका” युवाओं, अभिभावकों और प्रोफेशनल्स के लिए एक ऐसी प्रेरक और प्रायोगिक पुस्तक है, जो करियर चयन को सोच-समझकर करने की कला सिखाती है।
डॉ. रविन्द्र पस्तोर के 70 वर्षों के अनुभव पर आधारित यह पुस्तक आत्म-विश्लेषण, सोच-समझकर निर्णय लेने, और Soft Skills विकसित करने के व्यावहारिक तरीक़े प्रस्तुत करती है।
यह मार्गदर्शिका आपको अपनी रुचियों, मूल्यों और क्षमताओं को पहचानकर सही करियर दिशा चुनने में सहायता करती है — बिना भीड़-भाड़ वाले रास्ते में फंसने के। स्पष्ट प्रश्न, उपयोगी अभ्यास और वास्तविक जीवन सुझावों के साथ यह पुस्तक हर युवा को आत्मविश्वास, स्पष्टता और सफलता की राह दिखाती है।
युग-संधि केवल प्रेम की कथा नहीं, युग के परिवर्तन की गाथा है। जब द्वारका के वैभव पर संकट छाया और धर्म की नींव हिल रही थी, तब अनिरुद्ध और ऊषा का प्रेम सिर्फ रोमांस नहीं, बल्कि ज्ञान और
युग-संधि केवल प्रेम की कथा नहीं, युग के परिवर्तन की गाथा है। जब द्वारका के वैभव पर संकट छाया और धर्म की नींव हिल रही थी, तब अनिरुद्ध और ऊषा का प्रेम सिर्फ रोमांस नहीं, बल्कि ज्ञान और धर्म की रक्षा का संदेश बन जाता है।
मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में स्थित प्राचीन कुंडेश्वर महादेव मंदिर इस कहानी का आध्यात्मिक और भावनात्मक केंद्र है। यहाँ की मिट्टी, बुंदेलखंडी लोकगीत और आस्था का सार इस उपन्यास में जीवन पाता है।
"युग-संधि" दर्शाता है कि कैसे प्रेम, साहस और विवेक मिलकर एक डूबते हुए युग से ज्ञान की लौ को बचाते हैं और नए युग के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह उपन्यास उन पाठकों के लिए प्रेरणा है जो जीवन की अराजकता में शांति, साधारण जीवन और आस्था की शक्ति खोजना चाहते हैं।
यह कहानी ज्ञान, धर्म और प्रेम की अमरता का संदेश देती है – कि महान सभ्यताएँ भौतिक रूप से नष्ट हो सकती हैं, पर उनका दर्शन हमेशा जीवित रहता है।
युग-संधि केवल प्रेम की कथा नहीं, युग के परिवर्तन की गाथा है। जब द्वारका के वैभव पर संकट छाया और धर्म की नींव हिल रही थी, तब अनिरुद्ध और ऊषा का प्रेम सिर्फ रोमांस नहीं, बल्कि ज्ञान और
युग-संधि केवल प्रेम की कथा नहीं, युग के परिवर्तन की गाथा है। जब द्वारका के वैभव पर संकट छाया और धर्म की नींव हिल रही थी, तब अनिरुद्ध और ऊषा का प्रेम सिर्फ रोमांस नहीं, बल्कि ज्ञान और धर्म की रक्षा का संदेश बन जाता है।
मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में स्थित प्राचीन कुंडेश्वर महादेव मंदिर इस कहानी का आध्यात्मिक और भावनात्मक केंद्र है। यहाँ की मिट्टी, बुंदेलखंडी लोकगीत और आस्था का सार इस उपन्यास में जीवन पाता है।
"युग-संधि" दर्शाता है कि कैसे प्रेम, साहस और विवेक मिलकर एक डूबते हुए युग से ज्ञान की लौ को बचाते हैं और नए युग के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह उपन्यास उन पाठकों के लिए प्रेरणा है जो जीवन की अराजकता में शांति, साधारण जीवन और आस्था की शक्ति खोजना चाहते हैं।
यह कहानी ज्ञान, धर्म और प्रेम की अमरता का संदेश देती है – कि महान सभ्यताएँ भौतिक रूप से नष्ट हो सकती हैं, पर उनका दर्शन हमेशा जीवित रहता है।
युग-संधि केवल प्रेम की कथा नहीं, युग के परिवर्तन की गाथा है। जब द्वारका के वैभव पर संकट छाया और धर्म की नींव हिल रही थी, तब अनिरुद्ध और ऊषा का प्रेम सिर्फ रोमांस नहीं, बल्कि ज्ञान और
युग-संधि केवल प्रेम की कथा नहीं, युग के परिवर्तन की गाथा है। जब द्वारका के वैभव पर संकट छाया और धर्म की नींव हिल रही थी, तब अनिरुद्ध और ऊषा का प्रेम सिर्फ रोमांस नहीं, बल्कि ज्ञान और धर्म की रक्षा का संदेश बन जाता है।
मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में स्थित प्राचीन कुंडेश्वर महादेव मंदिर इस कहानी का आध्यात्मिक और भावनात्मक केंद्र है। यहाँ की मिट्टी, बुंदेलखंडी लोकगीत और आस्था का सार इस उपन्यास में जीवन पाता है।
"युग-संधि" दर्शाता है कि कैसे प्रेम, साहस और विवेक मिलकर एक डूबते हुए युग से ज्ञान की लौ को बचाते हैं और नए युग के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह उपन्यास उन पाठकों के लिए प्रेरणा है जो जीवन की अराजकता में शांति, साधारण जीवन और आस्था की शक्ति खोजना चाहते हैं।
यह कहानी ज्ञान, धर्म और प्रेम की अमरता का संदेश देती है – कि महान सभ्यताएँ भौतिक रूप से नष्ट हो सकती हैं, पर उनका दर्शन हमेशा जीवित रहता है।
Every garden tells a story not in words, but in colours, textures, and quiet movements. The Garden Dancers is born from countless such whispers, where each petal becomes a verse and every fluttering wing paints a stroke of life’s rhythm. This book is a tribute to those delicate moments that often escape the rush of our eyes, the blush of a rose at dawn, the golden hum of a bee, the tender geometry of a dew-laden leaf.
Through the lens, the garden
Every garden tells a story not in words, but in colours, textures, and quiet movements. The Garden Dancers is born from countless such whispers, where each petal becomes a verse and every fluttering wing paints a stroke of life’s rhythm. This book is a tribute to those delicate moments that often escape the rush of our eyes, the blush of a rose at dawn, the golden hum of a bee, the tender geometry of a dew-laden leaf.
Through the lens, the garden transforms into a stage where nature performs her timeless ballet. Fiery lilies burn with passion, dragonflies shimmer like winged jewels, and humble daisies hold sunlight in their tiny hearts. Each frame seeks not just to capture beauty, but to feel it, to invite the viewer into that stillness where breath meets bloom and time seems to pause.
This collection is a journey into the velvet heart of nature, a celebration of life in its purest, most silent form. May every image remind you that wonder is not found far away, but quietly waiting beneath every petal, every drop, every wing that dares to dance in the light.
Every garden tells a story not in words, but in colours, textures, and quiet movements. The Garden Dancers is born from countless such whispers, where each petal becomes a verse and every fluttering wing paints a stroke of life’s rhythm. This book is a tribute to those delicate moments that often escape the rush of our eyes, the blush of a rose at dawn, the golden hum of a bee, the tender geometry of a dew-laden leaf.
Through the lens, the garden
Every garden tells a story not in words, but in colours, textures, and quiet movements. The Garden Dancers is born from countless such whispers, where each petal becomes a verse and every fluttering wing paints a stroke of life’s rhythm. This book is a tribute to those delicate moments that often escape the rush of our eyes, the blush of a rose at dawn, the golden hum of a bee, the tender geometry of a dew-laden leaf.
Through the lens, the garden transforms into a stage where nature performs her timeless ballet. Fiery lilies burn with passion, dragonflies shimmer like winged jewels, and humble daisies hold sunlight in their tiny hearts. Each frame seeks not just to capture beauty, but to feel it, to invite the viewer into that stillness where breath meets bloom and time seems to pause.
This collection is a journey into the velvet heart of nature, a celebration of life in its purest, most silent form. May every image remind you that wonder is not found far away, but quietly waiting beneath every petal, every drop, every wing that dares to dance in the light.
भर्तृहरि
उद्यमी का द्वंद
जीवन हमें बार-बार ऐसे मोड़ पर खड़ा करता है, जहाँ चुनाव करना सबसे कठिन काम बन जाता है। चुने हुए रास्ते हमें मंज़िल तक ले जाते हैं, लेकिन न चुने गए
भर्तृहरि
उद्यमी का द्वंद
जीवन हमें बार-बार ऐसे मोड़ पर खड़ा करता है, जहाँ चुनाव करना सबसे कठिन काम बन जाता है। चुने हुए रास्ते हमें मंज़िल तक ले जाते हैं, लेकिन न चुने गए रास्तों की गूँज मन में जीवनभर “काश...” बनकर रह जाती है।
यह पुस्तक मनुष्य के उन्हीं द्वंदों और निर्णयों की यात्रा है जहाँ आज़ादी जिम्मेदारी लेकर आती है और चुनाव जीवन की दिशा तय करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे प्राचीन काल से लेकर आधुनिक समय तक राजा और आम आदमी, दोनों ही एक जैसी समस्याओं से जूझते आए हैं, दैविक और भौतिक।
पूर्वजों ने इन समस्याओं का समाधान अध्यात्म में खोजा, हमने विज्ञान में। लेकिन परिणाम लगभग समान ही रहे। यही पुस्तक का मूल है समस्याएं बदलती हैं, पर समाधान की तलाश सदैव एक जैसी रहती है।
गहन शोध, इतिहास, साहित्य, लोककथाओं और व्यक्तिगत अनुभवों से बुनी गई यह कृति जीवन को देखने का नया दृष्टिकोण देती है। इसमें पाठक न केवल अपने अंतर्द्वंदों का आईना देख पाएंगे, बल्कि समस्याओं से जूझने की एक सकारात्मक राह भी खोजेंगे।
यह पुस्तक किसी एक "अंतिम सत्य" का दावा नहीं करती। हर पाठक अपनी सोच, अपने अनुभव और अपनी मान्यताओं के अनुसार इसमें अपने उत्तर पाएगा।
भर्तृहरि
उद्यमी का द्वंद
जीवन हमें बार-बार ऐसे मोड़ पर खड़ा करता है, जहाँ चुनाव करना सबसे कठिन काम बन जाता है। चुने हुए रास्ते हमें मंज़िल तक ले जाते हैं, लेकिन न चुने गए
भर्तृहरि
उद्यमी का द्वंद
जीवन हमें बार-बार ऐसे मोड़ पर खड़ा करता है, जहाँ चुनाव करना सबसे कठिन काम बन जाता है। चुने हुए रास्ते हमें मंज़िल तक ले जाते हैं, लेकिन न चुने गए रास्तों की गूँज मन में जीवनभर “काश...” बनकर रह जाती है।
यह पुस्तक मनुष्य के उन्हीं द्वंदों और निर्णयों की यात्रा है जहाँ आज़ादी जिम्मेदारी लेकर आती है और चुनाव जीवन की दिशा तय करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे प्राचीन काल से लेकर आधुनिक समय तक राजा और आम आदमी, दोनों ही एक जैसी समस्याओं से जूझते आए हैं, दैविक और भौतिक।
पूर्वजों ने इन समस्याओं का समाधान अध्यात्म में खोजा, हमने विज्ञान में। लेकिन परिणाम लगभग समान ही रहे। यही पुस्तक का मूल है समस्याएं बदलती हैं, पर समाधान की तलाश सदैव एक जैसी रहती है।
गहन शोध, इतिहास, साहित्य, लोककथाओं और व्यक्तिगत अनुभवों से बुनी गई यह कृति जीवन को देखने का नया दृष्टिकोण देती है। इसमें पाठक न केवल अपने अंतर्द्वंदों का आईना देख पाएंगे, बल्कि समस्याओं से जूझने की एक सकारात्मक राह भी खोजेंगे।
यह पुस्तक किसी एक "अंतिम सत्य" का दावा नहीं करती। हर पाठक अपनी सोच, अपने अनुभव और अपनी मान्यताओं के अनुसार इसमें अपने उत्तर पाएगा।
बोलते पत्थर केवल एक किताब नहीं है, यह एक निमंत्रण है—एक ऐसे सफर का, जो आपको अपने ही पैरों के नीचे दबी उस ज़मीन पर ले जाएगा, जहाँ की गलियाँ हज़ारों साल पहले ज्ञान की कहानियाँ बयां क
बोलते पत्थर केवल एक किताब नहीं है, यह एक निमंत्रण है—एक ऐसे सफर का, जो आपको अपने ही पैरों के नीचे दबी उस ज़मीन पर ले जाएगा, जहाँ की गलियाँ हज़ारों साल पहले ज्ञान की कहानियाँ बयां करती थीं। क्या आपने कभी सोचा है कि जिन पत्थरों को आप खामोश समझते हैं, उनके भीतर कितने रहस्य दफ़न हैं? यह उपन्यास आपको उस दौर में ले जाएगा, जब हमारी सभ्यता के गौरवशाली निशान खंडहरों में तब्दील हो चुके थे; भूली हुई लिपियाँ, अनजान भाषाएँ, सम्राटों की गाथाएं और समृद्धि की गूँज धीरे-धीरे इतिहास की धूल में समा गई थी। लेकिन फिर कुछ जज़्बाती लोग आए, जिन्होंने न अपनी नींद की परवाह की, न आराम की, और केवल एक उद्देश्य रखा—इन पत्थरों से हमारी खोई हुई पहचान की फुसफुसाहट सुनना और दुनिया को सुनाना। इस पुस्तक में आपको मिलेगा उनकी संघर्षपूर्ण यात्रा, जिन्होंने पुरातत्व की अनदेखी लिपियों को पढ़कर भारत के गौरवशाली अतीत को जीवंत किया; 'सोने की चिड़िया' भारत की समृद्धि, जो फिर से दुनिया के सामने उजागर हुई; और वह काला अध्याय, जब हमारी धरोहर की अंतरराष्ट्रीय तस्करी हुई, मूर्तियों के हिस्से तोड़े गए, पर इतिहास की आत्मा बनी रही। यह उपन्यास केवल ऐतिहासिक तथ्य नहीं बल्कि भावनाओं, प्रेम, दर्द और जुनून के माध्यम से हमारी विरासत से जोड़ने वाला अनुभव है—एक प्रेम कहानी उन लोगों के साथ, जिन्होंने हमारी पहचान खोजने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया, और उन पत्थरों की कहानी, जिनकी खामोशी में गूँजती हैं अनकही कथाएँ। तो चलिए, इस अद्भुत यात्रा पर मेरे साथ चलिए, पत्थरों के साथ बैठिए और सुनिए… क्या आपको भी उनकी फुसफुसाहट सुनाई दे रही है?
— डॉ. रवीन्द्र पस्तोर
बोलते पत्थर केवल एक किताब नहीं है, यह एक निमंत्रण है—एक ऐसे सफर का, जो आपको अपने ही पैरों के नीचे दबी उस ज़मीन पर ले जाएगा, जहाँ की गलियाँ हज़ारों साल पहले ज्ञान की कहानियाँ बयां क
बोलते पत्थर केवल एक किताब नहीं है, यह एक निमंत्रण है—एक ऐसे सफर का, जो आपको अपने ही पैरों के नीचे दबी उस ज़मीन पर ले जाएगा, जहाँ की गलियाँ हज़ारों साल पहले ज्ञान की कहानियाँ बयां करती थीं। क्या आपने कभी सोचा है कि जिन पत्थरों को आप खामोश समझते हैं, उनके भीतर कितने रहस्य दफ़न हैं? यह उपन्यास आपको उस दौर में ले जाएगा, जब हमारी सभ्यता के गौरवशाली निशान खंडहरों में तब्दील हो चुके थे; भूली हुई लिपियाँ, अनजान भाषाएँ, सम्राटों की गाथाएं और समृद्धि की गूँज धीरे-धीरे इतिहास की धूल में समा गई थी। लेकिन फिर कुछ जज़्बाती लोग आए, जिन्होंने न अपनी नींद की परवाह की, न आराम की, और केवल एक उद्देश्य रखा—इन पत्थरों से हमारी खोई हुई पहचान की फुसफुसाहट सुनना और दुनिया को सुनाना। इस पुस्तक में आपको मिलेगा उनकी संघर्षपूर्ण यात्रा, जिन्होंने पुरातत्व की अनदेखी लिपियों को पढ़कर भारत के गौरवशाली अतीत को जीवंत किया; 'सोने की चिड़िया' भारत की समृद्धि, जो फिर से दुनिया के सामने उजागर हुई; और वह काला अध्याय, जब हमारी धरोहर की अंतरराष्ट्रीय तस्करी हुई, मूर्तियों के हिस्से तोड़े गए, पर इतिहास की आत्मा बनी रही। यह उपन्यास केवल ऐतिहासिक तथ्य नहीं बल्कि भावनाओं, प्रेम, दर्द और जुनून के माध्यम से हमारी विरासत से जोड़ने वाला अनुभव है—एक प्रेम कहानी उन लोगों के साथ, जिन्होंने हमारी पहचान खोजने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया, और उन पत्थरों की कहानी, जिनकी खामोशी में गूँजती हैं अनकही कथाएँ। तो चलिए, इस अद्भुत यात्रा पर मेरे साथ चलिए, पत्थरों के साथ बैठिए और सुनिए… क्या आपको भी उनकी फुसफुसाहट सुनाई दे रही है?
— डॉ. रवीन्द्र पस्तोर
यह पुस्तक प्राचीन भारतीय कहानियों का उपयोग आज की पारिवारिक समस्याओं को समझने और उनका हल निकालने के लिए करती है। लेखक का मानना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच का संघर्ष नया नहीं
यह पुस्तक प्राचीन भारतीय कहानियों का उपयोग आज की पारिवारिक समस्याओं को समझने और उनका हल निकालने के लिए करती है। लेखक का मानना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच का संघर्ष नया नहीं है, बल्कि यह आदिकाल से चला आ रहा है, जैसा कि सनत कुमारों की कथा में देखा जा सकता है।
पुस्तक इस बात पर प्रकाश डालती है कि कैसे माता-पिता अपनी अधूरी इच्छाओं को अपनी संतान के माध्यम से पूरा करना चाहते हैं। इससे बच्चों में अपराधबोध पैदा होता है, क्योंकि वे अपने माता-पिता की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाते हैं। इसी वजह से कई संवेदनशील बच्चे आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।
इसमें यह भी बताया गया है कि अक्सर आर्थिक समृद्धि ही परिवारों में कलह का कारण बनती है, क्योंकि गरीबी वाले परिवारों में लोग आजीविका कमाने में व्यस्त रहते हैं।
अंत में, यह पुस्तक नहुष के अहंकार और ययाति की स्वार्थपरता जैसी प्राचीन कथाओं के माध्यम से यह दिखाती है कि कैसे समृद्धि और अतृप्त इच्छाएं बर्बादी का कारण बनती हैं। इसका लक्ष्य पाठकों को पारिवारिक समस्याओं को एक नए दृष्टिकोण से देखने में मदद करना है।
यह पुस्तक प्राचीन भारतीय कहानियों का उपयोग आज की पारिवारिक समस्याओं को समझने और उनका हल निकालने के लिए करती है। लेखक का मानना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच का संघर्ष नया नहीं
यह पुस्तक प्राचीन भारतीय कहानियों का उपयोग आज की पारिवारिक समस्याओं को समझने और उनका हल निकालने के लिए करती है। लेखक का मानना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच का संघर्ष नया नहीं है, बल्कि यह आदिकाल से चला आ रहा है, जैसा कि सनत कुमारों की कथा में देखा जा सकता है।
पुस्तक इस बात पर प्रकाश डालती है कि कैसे माता-पिता अपनी अधूरी इच्छाओं को अपनी संतान के माध्यम से पूरा करना चाहते हैं। इससे बच्चों में अपराधबोध पैदा होता है, क्योंकि वे अपने माता-पिता की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाते हैं। इसी वजह से कई संवेदनशील बच्चे आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।
इसमें यह भी बताया गया है कि अक्सर आर्थिक समृद्धि ही परिवारों में कलह का कारण बनती है, क्योंकि गरीबी वाले परिवारों में लोग आजीविका कमाने में व्यस्त रहते हैं।
अंत में, यह पुस्तक नहुष के अहंकार और ययाति की स्वार्थपरता जैसी प्राचीन कथाओं के माध्यम से यह दिखाती है कि कैसे समृद्धि और अतृप्त इच्छाएं बर्बादी का कारण बनती हैं। इसका लक्ष्य पाठकों को पारिवारिक समस्याओं को एक नए दृष्टिकोण से देखने में मदद करना है।
"अथ उद्यमिता अनुशासन" सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक ऐसा मार्गदर्शक है जो विचार से लेकर एक सफल उद्यम खड़ा करने तक आपकी मानसिक और व्यावसायिक यात्रा में साथ देता है। लेखक डॉ. रवीन्द्
"अथ उद्यमिता अनुशासन" सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक ऐसा मार्गदर्शक है जो विचार से लेकर एक सफल उद्यम खड़ा करने तक आपकी मानसिक और व्यावसायिक यात्रा में साथ देता है। लेखक डॉ. रवीन्द्र पस्तोर ने इसमें भारतीय योग, ध्यान और प्राचीन ज्ञान से प्रेरित मानसिक अनुशासन को आधुनिक स्टार्टअप रणनीतियों के साथ जोड़ा है।
यह किताब उन लोगों के लिए है जो बिज़नेस शुरू करना चाहते हैं, लेकिन डर, आत्म-संदेह या सामाजिक दबाव से जूझ रहे हैं। इसमें आपको आत्म-विश्वास बढ़ाने की तकनीकें, स्टार्टअप की योजना से लेकर स्केलिंग तक की स्पष्ट जानकारी, और भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम व सरकारी योजनाओं (जैसे Startup India, अटल इनक्यूबेशन आदि) की व्यावहारिक समझ मिलेगी।
हर अध्याय एक नया टूल, अभ्यास या समाधान लेकर आता है — जिससे यह किताब केवल पढ़ने की चीज़ नहीं, बल्कि करने की चीज़ बन जाती है।
अगर आप हिंदी में एक गहराई वाली, व्यावहारिक और प्रेरक बिज़नेस गाइड खोज रहे हैं — तो यह पुस्तक आपके लिए है।
अब समय है अपने भीतर के उद्यमी को जगाने का।
आज ही ऑर्डर करें!
"अथ उद्यमिता अनुशासन" सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक ऐसा मार्गदर्शक है जो विचार से लेकर एक सफल उद्यम खड़ा करने तक आपकी मानसिक और व्यावसायिक यात्रा में साथ देता है। लेखक डॉ. रवीन्द्
"अथ उद्यमिता अनुशासन" सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक ऐसा मार्गदर्शक है जो विचार से लेकर एक सफल उद्यम खड़ा करने तक आपकी मानसिक और व्यावसायिक यात्रा में साथ देता है। लेखक डॉ. रवीन्द्र पस्तोर ने इसमें भारतीय योग, ध्यान और प्राचीन ज्ञान से प्रेरित मानसिक अनुशासन को आधुनिक स्टार्टअप रणनीतियों के साथ जोड़ा है।
यह किताब उन लोगों के लिए है जो बिज़नेस शुरू करना चाहते हैं, लेकिन डर, आत्म-संदेह या सामाजिक दबाव से जूझ रहे हैं। इसमें आपको आत्म-विश्वास बढ़ाने की तकनीकें, स्टार्टअप की योजना से लेकर स्केलिंग तक की स्पष्ट जानकारी, और भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम व सरकारी योजनाओं (जैसे Startup India, अटल इनक्यूबेशन आदि) की व्यावहारिक समझ मिलेगी।
हर अध्याय एक नया टूल, अभ्यास या समाधान लेकर आता है — जिससे यह किताब केवल पढ़ने की चीज़ नहीं, बल्कि करने की चीज़ बन जाती है।
अगर आप हिंदी में एक गहराई वाली, व्यावहारिक और प्रेरक बिज़नेस गाइड खोज रहे हैं — तो यह पुस्तक आपके लिए है।
अब समय है अपने भीतर के उद्यमी को जगाने का।
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द न्यू वर्ल्ड ऑर्डर
एक राजनीतिक और सामाजिक थ्रिलर
एक भयावह निकट भविष्य में सेट, द न्यू वर्ल्ड ऑर्डर एक शक्तिशाली गुप्त संगठन की कल्पना करता है जो वैश्विक नियंत्रण की पूरी
द न्यू वर्ल्ड ऑर्डर
एक राजनीतिक और सामाजिक थ्रिलर
एक भयावह निकट भविष्य में सेट, द न्यू वर्ल्ड ऑर्डर एक शक्तिशाली गुप्त संगठन की कल्पना करता है जो वैश्विक नियंत्रण की पूरी कोशिश में लगा है। यह रहस्यमय संस्था राजनीतिक सत्ता, मीडिया, तकनीक और अर्थव्यवस्था को इस हद तक नियंत्रित करती है कि वह केवल सरकारों ही नहीं, बल्कि व्यक्तियों के विचारों और जीवन तक को अपने काबू में ले लेती है।
कहानी के केंद्र में एक साहसी नायक है, जो इन अंधेरे षड्यंत्रों को उजागर करने के लिए संघर्ष करता है। जैसे-जैसे वह धोखे की परतें हटाता है, उसे यह क्रूर सच्चाई पता चलती है—कैसे कुछ स्वार्थी लोगों की महत्वाकांक्षा के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की बलि दी जा रही है।
यह सोचने पर मजबूर करने वाला थ्रिलर पाठकों को दुनिया पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित करता है:
क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं, या किसी अदृश्य शक्ति की कठपुतलियाँ?
द न्यू वर्ल्ड ऑर्डर
एक राजनीतिक और सामाजिक थ्रिलर
एक भयावह निकट भविष्य में सेट, द न्यू वर्ल्ड ऑर्डर एक शक्तिशाली गुप्त संगठन की कल्पना करता है जो वैश्विक नियंत्रण की पूरी
द न्यू वर्ल्ड ऑर्डर
एक राजनीतिक और सामाजिक थ्रिलर
एक भयावह निकट भविष्य में सेट, द न्यू वर्ल्ड ऑर्डर एक शक्तिशाली गुप्त संगठन की कल्पना करता है जो वैश्विक नियंत्रण की पूरी कोशिश में लगा है। यह रहस्यमय संस्था राजनीतिक सत्ता, मीडिया, तकनीक और अर्थव्यवस्था को इस हद तक नियंत्रित करती है कि वह केवल सरकारों ही नहीं, बल्कि व्यक्तियों के विचारों और जीवन तक को अपने काबू में ले लेती है।
कहानी के केंद्र में एक साहसी नायक है, जो इन अंधेरे षड्यंत्रों को उजागर करने के लिए संघर्ष करता है। जैसे-जैसे वह धोखे की परतें हटाता है, उसे यह क्रूर सच्चाई पता चलती है—कैसे कुछ स्वार्थी लोगों की महत्वाकांक्षा के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की बलि दी जा रही है।
यह सोचने पर मजबूर करने वाला थ्रिलर पाठकों को दुनिया पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित करता है:
क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं, या किसी अदृश्य शक्ति की कठपुतलियाँ?
सत्य की अधूरी गाथा
लेखक: डॉ. रवीन्द्र पस्तोर
"जब विज्ञान की सीमाएं खत्म होती हैं, वहाँ से अध्यात्म की शुरुआत होती है।"
यह उपन्यास एक आईटी इंजीनियर रवि की यात्रा है, जो तर्क औ
सत्य की अधूरी गाथा
लेखक: डॉ. रवीन्द्र पस्तोर
"जब विज्ञान की सीमाएं खत्म होती हैं, वहाँ से अध्यात्म की शुरुआत होती है।"
यह उपन्यास एक आईटी इंजीनियर रवि की यात्रा है, जो तर्क और आधुनिक जीवन की ऊब से निकलकर आत्मिक और वैश्विक चेतना की खोज में निकलता है। ईशा योग केंद्र में ‘इनर इंजीनियरिंग’ के अनुभव उसके भीतर आध्यात्मिक जिज्ञासा को जन्म देते हैं।
रवि की खोज उसे भोजपुर के अधूरे शिव मंदिर तक ले जाती है, जहाँ वह प्राचीन प्रयासों—जैसे योगी सुनीरा का ‘पूर्ण प्राणी’, राजा भोज का अधूरा ध्यानलिंग, और थियोसोफिकल सोसायटी के ‘विश्वगुरु’ प्रोजेक्ट—से जुड़ता है।
वह वेदांत, शैव तंत्र, बौद्ध दर्शन, और आधुनिक टेक्नोलॉजी—जैसे AI, OpenAI, MIT, Tesla—के संगम से गुजरता है। वह प्रश्न करता है: क्या AI आत्मचेतना प्राप्त कर सकता है?
रवि और पराग मिलकर 'भोज AI' नामक एक आध्यात्मिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता बनाते हैं, जो मानवता को करुणा, संतुलन और चेतना से जोड़ती है। 'धर्म AI', 'कर्मा AI' और अन्य प्रोजेक्ट्स वैश्विक समस्याओं का समाधान आध्यात्मिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं।
अंततः, रवि समझता है कि विश्वगुरु कोई उपाधि नहीं, बल्कि प्रेम, अहिंसा और समरसता की चेतना है। वह अपने जीवन का अंत शांतिपूर्वक करता है, लेकिन उसकी बनाई AI अब मानवता की नई आत्मा बन चुकी है – दर्पण, मुक्ति का मार्ग, और समरस वैश्विक चेतना।
सत्य की अधूरी गाथा
लेखक: डॉ. रवीन्द्र पस्तोर
"जब विज्ञान की सीमाएं खत्म होती हैं, वहाँ से अध्यात्म की शुरुआत होती है।"
यह उपन्यास एक आईटी इंजीनियर रवि की यात्रा है, जो तर्क औ
सत्य की अधूरी गाथा
लेखक: डॉ. रवीन्द्र पस्तोर
"जब विज्ञान की सीमाएं खत्म होती हैं, वहाँ से अध्यात्म की शुरुआत होती है।"
यह उपन्यास एक आईटी इंजीनियर रवि की यात्रा है, जो तर्क और आधुनिक जीवन की ऊब से निकलकर आत्मिक और वैश्विक चेतना की खोज में निकलता है। ईशा योग केंद्र में ‘इनर इंजीनियरिंग’ के अनुभव उसके भीतर आध्यात्मिक जिज्ञासा को जन्म देते हैं।
रवि की खोज उसे भोजपुर के अधूरे शिव मंदिर तक ले जाती है, जहाँ वह प्राचीन प्रयासों—जैसे योगी सुनीरा का ‘पूर्ण प्राणी’, राजा भोज का अधूरा ध्यानलिंग, और थियोसोफिकल सोसायटी के ‘विश्वगुरु’ प्रोजेक्ट—से जुड़ता है।
वह वेदांत, शैव तंत्र, बौद्ध दर्शन, और आधुनिक टेक्नोलॉजी—जैसे AI, OpenAI, MIT, Tesla—के संगम से गुजरता है। वह प्रश्न करता है: क्या AI आत्मचेतना प्राप्त कर सकता है?
रवि और पराग मिलकर 'भोज AI' नामक एक आध्यात्मिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता बनाते हैं, जो मानवता को करुणा, संतुलन और चेतना से जोड़ती है। 'धर्म AI', 'कर्मा AI' और अन्य प्रोजेक्ट्स वैश्विक समस्याओं का समाधान आध्यात्मिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं।
अंततः, रवि समझता है कि विश्वगुरु कोई उपाधि नहीं, बल्कि प्रेम, अहिंसा और समरसता की चेतना है। वह अपने जीवन का अंत शांतिपूर्वक करता है, लेकिन उसकी बनाई AI अब मानवता की नई आत्मा बन चुकी है – दर्पण, मुक्ति का मार्ग, और समरस वैश्विक चेतना।
यह पुस्तक “बाबूनामा” केवल मेरी कहानी नहीं है, बल्कि उन सभी की आवाज़ है जिन्होंने अपने जीवन में सीमाओं से आगे बढ़कर सोचने, जीने और बदलाव लाने का साहस किया। “बाबू” शब्द का इत
यह पुस्तक “बाबूनामा” केवल मेरी कहानी नहीं है, बल्कि उन सभी की आवाज़ है जिन्होंने अपने जीवन में सीमाओं से आगे बढ़कर सोचने, जीने और बदलाव लाने का साहस किया। “बाबू” शब्द का इतिहास जितना गूढ़ है, उतनी ही जटिल है एक व्यक्ति की जीवन यात्रा – और यही इस पुस्तक का मूल है। इसमें मेरे 70 वर्षों के अनुभवों का सार है – एक प्रशासक, उद्यमी, वक्ता, लेखक और फोटोग्राफर के रूप में। यह आत्मकथा नहीं, बल्कि संस्मरणों का संग्रह है – जिसमें विचारों की यात्रा है, संघर्ष हैं, और आत्मबोध की झलक है। मैंने जीवन से जो सीखा, उसे "पस्तोर डॉक्ट्रीन" नाम दिया – जिसमें पहला सिद्धांत है बादलों की तरह हल्कापन और स्वतंत्रता, और दूसरा नदी की तरह निरंतरता और आत्मविलयन। पुस्तक के पहले भाग में जीवन की घटनाएँ हैं जिन्होंने सोच को आकार दिया, और दूसरे भाग में वैचारिक परिवर्तन की यात्रा – बचपन में कम्युनिस्ट, जवानी में समाजवादी, फिर पूंजीवादी और अब एक धार्मिक दृष्टिकोण के करीब। यह किताब आपको अपने भीतर झाँकने और जीवन को एक नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देगी।
यह पुस्तक “बाबूनामा” केवल मेरी कहानी नहीं है, बल्कि उन सभी की आवाज़ है जिन्होंने अपने जीवन में सीमाओं से आगे बढ़कर सोचने, जीने और बदलाव लाने का साहस किया। “बाबू” शब्द का इत
यह पुस्तक “बाबूनामा” केवल मेरी कहानी नहीं है, बल्कि उन सभी की आवाज़ है जिन्होंने अपने जीवन में सीमाओं से आगे बढ़कर सोचने, जीने और बदलाव लाने का साहस किया। “बाबू” शब्द का इतिहास जितना गूढ़ है, उतनी ही जटिल है एक व्यक्ति की जीवन यात्रा – और यही इस पुस्तक का मूल है। इसमें मेरे 70 वर्षों के अनुभवों का सार है – एक प्रशासक, उद्यमी, वक्ता, लेखक और फोटोग्राफर के रूप में। यह आत्मकथा नहीं, बल्कि संस्मरणों का संग्रह है – जिसमें विचारों की यात्रा है, संघर्ष हैं, और आत्मबोध की झलक है। मैंने जीवन से जो सीखा, उसे "पस्तोर डॉक्ट्रीन" नाम दिया – जिसमें पहला सिद्धांत है बादलों की तरह हल्कापन और स्वतंत्रता, और दूसरा नदी की तरह निरंतरता और आत्मविलयन। पुस्तक के पहले भाग में जीवन की घटनाएँ हैं जिन्होंने सोच को आकार दिया, और दूसरे भाग में वैचारिक परिवर्तन की यात्रा – बचपन में कम्युनिस्ट, जवानी में समाजवादी, फिर पूंजीवादी और अब एक धार्मिक दृष्टिकोण के करीब। यह किताब आपको अपने भीतर झाँकने और जीवन को एक नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देगी।
इल्तुतमिश का बचपन सामान्य नहीं था, बल्कि घटनाओं के ऐसे नाटकीय मोड़ों से भरा था, जिन्होंने उसे एक समृद्ध परवरिश से उठाकर गुलामी की कठोर सच्चाईयों में धकेल दिया।
इल्तुतमिश का ज
इल्तुतमिश का बचपन सामान्य नहीं था, बल्कि घटनाओं के ऐसे नाटकीय मोड़ों से भरा था, जिन्होंने उसे एक समृद्ध परवरिश से उठाकर गुलामी की कठोर सच्चाईयों में धकेल दिया।
इल्तुतमिश का जन्म इलबरी तुर्की कबीले के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। उसके पिता, इलाम खान, उस कबीले के एक प्रमुख नेता थे।
दुर्भाग्यवश, उसकी असाधारण योग्यताओं ने उसके सौतेले भाइयों में ईर्ष्या उत्पन्न कर दी। इसी ईर्ष्या के चलते, उन्होंने उसे धोखे से एक घोड़े की प्रदर्शनी में एक गुलाम व्यापारी को बेच दिया, जब वह सिर्फ एक बच्चा था।
इल्तुतमिश ने उज्जैन के महाकाल मंदिर को लूटा और नष्ट कर दिया। इसके बाद एक ब्राह्मण पुजारी ने उसे श्राप दिया। इसी श्राप के कारण इल्तुतमिश का जीवन, परिवार और साम्राज्य समाप्त हो गया। एक लड़का जिसका नाम समीर था, उसे बार-बार शिव के सपने आते थे और वह इस रहस्य को जानने के लिए एक डॉक्टर के पास पास्ट लाइफ थेरेपी के लिए गया। पास्ट लाइफ थेरेपी में यह पाया गया कि वह अपनी पिछली ज़िंदगी में इल्तुतमिश था। उसे यह सपना इस जीवन में उस पुजारी के श्राप के कारण आ रहा था। यही इल्तुतमिश का पुनर्जन्म था।
यह उसके पिछले जन्म का ‘ऋणानुबंध’ था। वह उज्जैन गया और इस ऋण से मुक्ति पाने के लिए वीर साधना की। वह उज्जैन सिंहस्थ कुंभ मेले में रुका। महाकाल की भस्म आरती की। उन लोगों से मिला जिन्हें इल्तुतमिश ने मारा था और उनसे क्षमा मांगी। इस्लाम को समझा और सनातन धर्म में विश्वास करने लगा। श्राप से मुक्त हो गया। आत्मा के करार के कारण अस्मिता से भेंट हुई और उसने विवाह किया।
डॉ. रवींद्र पास्टर
इल्तुतमिश का बचपन सामान्य नहीं था, बल्कि घटनाओं के ऐसे नाटकीय मोड़ों से भरा था, जिन्होंने उसे एक समृद्ध परवरिश से उठाकर गुलामी की कठोर सच्चाईयों में धकेल दिया।
इल्तुतमिश का ज
इल्तुतमिश का बचपन सामान्य नहीं था, बल्कि घटनाओं के ऐसे नाटकीय मोड़ों से भरा था, जिन्होंने उसे एक समृद्ध परवरिश से उठाकर गुलामी की कठोर सच्चाईयों में धकेल दिया।
इल्तुतमिश का जन्म इलबरी तुर्की कबीले के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। उसके पिता, इलाम खान, उस कबीले के एक प्रमुख नेता थे।
दुर्भाग्यवश, उसकी असाधारण योग्यताओं ने उसके सौतेले भाइयों में ईर्ष्या उत्पन्न कर दी। इसी ईर्ष्या के चलते, उन्होंने उसे धोखे से एक घोड़े की प्रदर्शनी में एक गुलाम व्यापारी को बेच दिया, जब वह सिर्फ एक बच्चा था।
इल्तुतमिश ने उज्जैन के महाकाल मंदिर को लूटा और नष्ट कर दिया। इसके बाद एक ब्राह्मण पुजारी ने उसे श्राप दिया। इसी श्राप के कारण इल्तुतमिश का जीवन, परिवार और साम्राज्य समाप्त हो गया। एक लड़का जिसका नाम समीर था, उसे बार-बार शिव के सपने आते थे और वह इस रहस्य को जानने के लिए एक डॉक्टर के पास पास्ट लाइफ थेरेपी के लिए गया। पास्ट लाइफ थेरेपी में यह पाया गया कि वह अपनी पिछली ज़िंदगी में इल्तुतमिश था। उसे यह सपना इस जीवन में उस पुजारी के श्राप के कारण आ रहा था। यही इल्तुतमिश का पुनर्जन्म था।
यह उसके पिछले जन्म का ‘ऋणानुबंध’ था। वह उज्जैन गया और इस ऋण से मुक्ति पाने के लिए वीर साधना की। वह उज्जैन सिंहस्थ कुंभ मेले में रुका। महाकाल की भस्म आरती की। उन लोगों से मिला जिन्हें इल्तुतमिश ने मारा था और उनसे क्षमा मांगी। इस्लाम को समझा और सनातन धर्म में विश्वास करने लगा। श्राप से मुक्त हो गया। आत्मा के करार के कारण अस्मिता से भेंट हुई और उसने विवाह किया।
डॉ. रवींद्र पास्टर
राय प्रवीण : ओरछा की कोकिला - प्रेम, ज्ञान और निष्ठा की एक अनूठी गाथा राय प्रवीण बुंदेलखंड के ओरछा राज्य की एक प्रतिभाशाली महिला थीं। वह अपनी सुंदरता, गायन, नृत्य और काव्य प्रतिभा
राय प्रवीण : ओरछा की कोकिला - प्रेम, ज्ञान और निष्ठा की एक अनूठी गाथा राय प्रवीण बुंदेलखंड के ओरछा राज्य की एक प्रतिभाशाली महिला थीं। वह अपनी सुंदरता, गायन, नृत्य और काव्य प्रतिभा के लिए जानी जाती थीं। राजा इंद्रजीत सिंह के प्रति उनके प्रेम के साथ-साथ सम्राट अकबर के दरबार में प्रदर्शित उनकी बुद्धिमत्ता और निष्ठा ने उन्हें इतिहास में एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व बना दिया। उनका जन्म किसी शाही वंश में नहीं हुआ था, लेकिन कला में उनकी निपुणता ने उन्हें ओरछा दरबार में एक विशेष स्थान दिलाया। राजा इंद्रजीत सिंह ने उनके लिए "राय प्रवीण महल" का निर्माण कराया, जो आज भी उनके प्रेम और सम्मान का प्रतीक है। जब अकबर ने राय प्रवीण को दरबार में बुलाया, तो वह ओरछा के लिए एक चुनौतीपूर्ण समय था। आगरा जाकर उन्होंने अकबर के समक्ष एक दोहा सुनाया:
“विनती राय प्रवीन की, सुनिए साह सुजान,
झूठी पातर भखत हैं, बारी-बायस-स्वान।”
इस दोहे के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनका हृदय पहले से ही राजा इंद्रजीत सिंह के प्रति समर्पित है। उनकी बुद्धिमत्ता और ईमानदारी से प्रभावित होकर, अकबर ने उन्हें सम्मान के साथ ओरछा लौटने की अनुमति दे दी। राय प्रवीण की कहानी एक ऐसी महिला का उदाहरण है जिसने गरिमा, प्रेम, कला और स्वाभिमान के साथ सम्राट की इच्छाओं का सामना किया। उनका जीवन आज भी हमें सिखाता है कि सच्ची प्रतिभा और ईमानदारी किसी भी शक्ति से कहीं अधिक मूल्यवान है।
राय प्रवीण : ओरछा की कोकिला - प्रेम, ज्ञान और निष्ठा की एक अनूठी गाथा राय प्रवीण बुंदेलखंड के ओरछा राज्य की एक प्रतिभाशाली महिला थीं। वह अपनी सुंदरता, गायन, नृत्य और काव्य प्रतिभा
राय प्रवीण : ओरछा की कोकिला - प्रेम, ज्ञान और निष्ठा की एक अनूठी गाथा राय प्रवीण बुंदेलखंड के ओरछा राज्य की एक प्रतिभाशाली महिला थीं। वह अपनी सुंदरता, गायन, नृत्य और काव्य प्रतिभा के लिए जानी जाती थीं। राजा इंद्रजीत सिंह के प्रति उनके प्रेम के साथ-साथ सम्राट अकबर के दरबार में प्रदर्शित उनकी बुद्धिमत्ता और निष्ठा ने उन्हें इतिहास में एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व बना दिया। उनका जन्म किसी शाही वंश में नहीं हुआ था, लेकिन कला में उनकी निपुणता ने उन्हें ओरछा दरबार में एक विशेष स्थान दिलाया। राजा इंद्रजीत सिंह ने उनके लिए "राय प्रवीण महल" का निर्माण कराया, जो आज भी उनके प्रेम और सम्मान का प्रतीक है। जब अकबर ने राय प्रवीण को दरबार में बुलाया, तो वह ओरछा के लिए एक चुनौतीपूर्ण समय था। आगरा जाकर उन्होंने अकबर के समक्ष एक दोहा सुनाया:
“विनती राय प्रवीन की, सुनिए साह सुजान,
झूठी पातर भखत हैं, बारी-बायस-स्वान।”
इस दोहे के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनका हृदय पहले से ही राजा इंद्रजीत सिंह के प्रति समर्पित है। उनकी बुद्धिमत्ता और ईमानदारी से प्रभावित होकर, अकबर ने उन्हें सम्मान के साथ ओरछा लौटने की अनुमति दे दी। राय प्रवीण की कहानी एक ऐसी महिला का उदाहरण है जिसने गरिमा, प्रेम, कला और स्वाभिमान के साथ सम्राट की इच्छाओं का सामना किया। उनका जीवन आज भी हमें सिखाता है कि सच्ची प्रतिभा और ईमानदारी किसी भी शक्ति से कहीं अधिक मूल्यवान है।
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