दुनियादारी वाले प्यार में शरीर की प्रधानता होती है । संसार में
ज्यादातर ऐसा ही हुआ करता है। देह से शुरु होकर देह पर ही खतम हो जाता है
प्यार । प्यार एकदम नश्वर है । इसकी कोई गारन्टी नहीं । जन्म-जन्मान्तर
की जो बातें की जाती हैं, उनमें कोई तथ्य नहीं होता । कहने वाला भी अच्छी
तरह जानता है और सुननेवाला भी अच्छी तरह समझता है कि ये सब होठों से
निकले हुए झांसेदार शब्दावलियाँ हैं, सिर्फ तन को भोगने के लिए। होठों का
ये संवाद-संकेत दिल तक पहुँचाता ही नहीं। किन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है
कि हाड़-मांस निर्मित पार्थिव शरीर बिलकुल गौंण हो जाता है—महत्त्वहीन हो
जाता है और तब देह-गेह से ऊपर उठकर, आत्मा की धरातल पर जो अहैतुकी स्नेह
उत्पन्न होता है उसे प्यार नहीं, प्रेम कहते हैं—A DIVINE LOVE. ये
अंग्रेजी वाले छिछले Love से बहुत ही ऊँची और गहरी चीज है। इसकी ऊँचाई और
गहराई का अन्दाजा सामान्यजन लगा भी नहीं सकते। प्रेम सदा शाश्वत होता है।
अनश्वर होता है। स्वाभाविक है कि इसका अस्तित्व जन्मान्तर तक बना रहेगा ।
कुछ ऐसी ही अमर प्रेमकथा का चित्रण है पुनर्भव में।