शक्ति की राजनीति: 21वीं सदी के मध्य में शक्ति–संतुलन की तीसरी लहर समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की उस गहन संरचनात्मक परिवर्तनशीलता का विश्लेषण करती है, जहाँ एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का क्षरण और बहुध्रुवीय विश्व का उदय स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। यह पुस्तक पॉल केनेडी के साम्राज्यिक अतिविस्तार के सिद्धांत को आधार बनाते हुए तर्क देती है कि 21वीं सदी में शक्ति का उदय और पतन अब केवल सैन्य या आर्थिक कारकों से निर्धारित नहीं होता, बल्कि तकनीक, भू-अर्थशास्त्र, साइबरस्पेस, वैचारिक वैधता और संस्थागत क्षमता जैसे नए आयामों से संचालित होता है।
यह ग्रंथ शक्ति-संतुलन की तीन ऐतिहासिक लहरों—साम्राज्यवादी विस्तार, शीतयुद्धीय द्विध्रुवीयता और वर्तमान बहुध्रुवीय संक्रमण—का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। चीन का उदय, रूस की पुनरुत्थानवादी रणनीति, अमेरिका की बदलती भूमिका और भारत की संतुलनकारी नीति इस विश्लेषण के केंद्र में हैं। इंडो-पैसिफिक, अफ्रीका, आर्कटिक, साइबरस्पेस और बाह्य अंतरिक्ष जैसे नए रणनीतिक रंगमंचों के माध्यम से पुस्तक यह दिखाती है कि “द ग्रेट गेम” अब केवल भूगोल तक सीमित नहीं रहा।
भारत-केंद्रित दृष्टिकोण के साथ यह पुस्तक न केवल वैश्विक शक्ति-राजनीति की व्याख्या करती है, बल्कि भविष्य की विश्व व्यवस्था के लिए रणनीतिक चेतना, नीति-निर्देशन और बौद्धिक तैयारी का आह्वान भी करती है। यह ग्रंथ शोधार्थियों, नीति-निर्माताओं, सिविल सेवा अभ्यर्थियों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक अनिवार्य पाठ है।
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