स्याही के सुमन की शुरूआत काफ़ी मज़ेदार रहा है। इनके जीवन में दुखों की सुनामी ना आई होती तो स्याही के सुमन जन्मता ही नहीं। पाँच सितारा होटल से जेल यात्रा तक का सफर। महानगर की चकाचौंध से ढाई सालों का काल कोठरी प्रवास। ख़ुशियों के बसंत की बीच दुखों का सावन भादों। ज़िंदगी मानो तो इनका इम्तिहान ले रही थी। मानसिक रूप से अस्थिरता और जेल जीवन के लिए ख़ुद को सँभालना। अकेलापन निरंतर कुछ ना कुछ लिखने के लिए प्रेरित किया। मेरी पहली रचना जीवन का महत्व था जो पवित्र संदेश में प्रकाशित हुआ जिस में प्रभु येशु के महत्वों का उल्लेख किया हूँ। लोग बोलते है किसी भी शुभ कार्य के पहले प्रभु का स्मरण करना चाहिए। मेरी पहली रचना प्रभु की स्तुति थी। एक प्रयास है ज़िंदगी के खट्टे मीठे अनुभव, संवेदना, पीड़ा और उमंग को कविता के रूप में मेरी पुस्तक स्याही के सुमन में अलंकृत है।