अंडा भात- मध्याहन भोजन

बाल साहित्य
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माँ हम नहीं जाएंगे स्कूल। मेरा मन नहीं है - यह कहते हुए मंगला ने माँ से स्कूल नहीं जाने के लिए गुहार की। मंगला की माँ आंगन में धान उसन रही थी। चूल्हे में लकड़ी ठेलते हुए माँ ने कहा - अरे बबुआ आज तो शुक्रवार है और आज स्कूल में तो अंडा भात बन रहा होगा। अंडा भात नहीं खाना है क्या?
अंडा भात के बारे में सोचकर मंगला के मुंह में पानी आ गया लेकिन उसने स्कूल में सुमन से पांच रुपया उधार लिया था और शुक्रवार को लौटाने का वादा किया था। भोरे भोर पप्पा से कलम खरीदने के लिए पांच रुपए मांगे थे लेकिन मंगला के पापा ने यह कहकर मना कर दिया कि खुद तो खैनी खरीदने के लिए पैसे नहीं है और तुम्हें कहां से पांच रुपए दूं!
आज सुमन को पांच रुपया नहीं लौटाया तो सुमन उसको छोड़ेगा नहीं।


एक तरफ़ अंडा भात तो दूसरी तरफ़ सुमन का उधार। अंडा भात के खयाल से मुंह में आए पानी को घोंटते हुए मंगला ने फ़िर माँ से कहा -
स्कूल में तो पढ़ाई भी नहीं होती है! पढ़ाने के टाइम मास्टर साहब चौक पर पान खाने चले जाते हैं। माँ ने इस बार मंगला को डपटते हुए कहा - सीधा तैयार होकर स्कूल जाओ। हम वहां तुमको ज्ञान लेने नहीं भेजते हैं। ज्ञान नहीं तो क्या कम से कम भात तो मिलता ही है। यहां बाप के भरोसे रहोगे तो नून रोटी के अलावा कुछ भी नहीं मिलेगा। मंगला की माँ ने एक नज़र खटिए पर सोए मंगला के बाप पर दौड़ाई और मन ही मन अपने पति को हज़ार गालियां दी।
माँ की गरीबी और बाप के निठल्लेपन पर मंगला को तरस आया। उसने ब्लू हाफ पैंट और आसमानी शर्ट पहनकर बस्ता लिया और घर से स्कूल के लिए निकल गया।
स्कूल ड्रेस पहने। पीठ पर बस्ता टांगे मंगला अपनी ही धुन में चला जा रहा था कि तभी किसी ने पीछे से कहा - क्या रे मंगला, अंडा भात खाने जा रहा है? मंगला ने पीछे मुड़कर देखा तो रोशन था। रोशन गांव के ही स्कूल के मास्टर साहब का बेटा है। तुम नहीं चल रहे क्या? मंगला ने उल्टा प्रश्न किया।
नहीं, मैं अब से गांव के स्कूल नहीं जाऊंगा!
क्यों?
क्योंकि मेरा एडमिशन शहर के बड़े अंग्रेजी स्कूल में हो गया है। अब मैं सोमवार से शहर के अंग्रेजी स्कूल में जाऊंगा!
शहर तो गांव से बहुत दूर है तो तुम रोज़ स्कूल कैसे जाओगे? मंगला ने आश्चर्य करते हुए पूछा।
अरे तुम्हें नहीं पता? अब तो शहर से स्कूल की बस आती है और बच्चों को उठा ले जाती है।
नहीं, मुझे नहीं पता था! मंगला ने दबे हुए स्वर में कहा।
हां, तुम्हें पता भी कैसे होगा! बस सिर्फ़ हमारे टोले ही आती है।तुम्हारा टोला निचली जात वाला है और वहां कोई पढ़ने लिखने वाला तो है नहीं जो वहां बस आएगी ।
क्यों मैं हूं न पढ़ने लिखने वाला?
तुम? अरे तुम तो अंडा भात प्रेमी हो! गणित प्रेमी नहीं!


अंडा भात का नाम सुनते ही फ़िर से मंगला के मुंह में पानी आ गया था और वो तेज़ी से स्कूल की तरफ़ बढ़ने लगा। स्कूल पहुंचकर मंगला ने सबसे पहले सुमन को ढूंढ़ना चाहा। उसने सोचा कि इससे पहले सुमन उसका कॉलर पकड़े उससे पहले ही वो सुमन के सामने हाज़िर हो जाएगा और किसी तरह कल निश्चित ही रुपए लौटा देने के लिए सुमन को मना लेगा । उसने स्कूल में हर जगह सुमन को ढूंढा लेकिन सुमन उसे कहीं नहीं मिला। सुमन आज स्कूल नहीं आया था। मंगला ने अब राहत की सांस ली। मन ही मन उसने माँ को शुक्रिया कहा। माँ अगर सुबह स्कूल नहीं आने के लिए मान जाती तो उसे खामाखां अंडा भात खाए बिना ही हाथ धोना पड़ता।


शुक्रवार के दिन जहां विद्यार्थियों के लिए मध्याह्न भोजन में अंडा भात बनता है, वहीं आज के दिन सभी शिक्षकों के लिए अलग से मुर्गा और लंबे लंबे दाने वाले खुशबुदार चावल का भात बनता है। आज के दिन शिक्षक सब भी बहुत प्रसन्न रहते हैं। एक दो मास्टर साहब तो हाजमोला खाकर मैदान भी हो आते हैं ताकि पतीले जैसा निकला पेट ठीक से भर सके।
अभी अभी सुरेश बाबू मैदान मार कर आए और रंजीत बाबू से पूछा -
का हो रंजीत बाबू मुर्गा सीझा कि नहीं?
अभी मुर्गा में टाइम है महाराज! गमक सूंघकर दिलीप को बुलाए थे तो बोला कि अभी आधा घंटा आऊर लगेगा!
जो कहिए ई दिलीपबा ससुरी मुर्गा बनाता बड़ा बेजोड़ है हो! स्याला होटल वाला का कान काट लेने का हुनर है दिलीप में!
एकदम सही कह रहे हैं आप सुरेश बाबू। पिछला शुक्कर रोशना के माता के लिए भी एक टिफिन मुर्गा ले गए थे। बोल रही थी कि दिलीप के हाथ में जादू है।
बात तो सही ही कही है भाभी जी। और सब सुनाइए मालिक, रोशन का क्या हुआ रंजीत बाबू? एडमिशन हुआ शहर के स्कूल में?
महादेव की कृपा से हो गया हो सुरेश बाबू। सोमवार से रोशन भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ेगा।
तो रोशना का यहां से नाम कटवा लिए क्या?
ना हो सुरेश बाबू! नाम कटवा लेंगे यहां से तो सरकारी योजनाओं का लाभ कैसे मिलेगा। शहर के अंग्रेजी स्कूल में पढ़ेगा और यहां सरकारी स्कूल में हाज़िरी भी बनता रहेगा।
तब फ़िर ठीक है। आजकल सरकार भी विद्यार्थी सब पर ख़ूब पैसा लूटा रही है।
विद्यार्थी सब पर कि हम सब पर? रंजीत बाबू ने मुस्कुराते हुए प्रश्न दागा।
सरकार जनता को लूट रही और हम सब सरकार को! इसमें क्या गलत है। इतना कहकर सुरेश बाबू ठहाका मारकर हंसने लगे।रंजीत बाबू ने मुस्कुराकर साथ दिया।


एक बज गया था। टिफिन की घंटी लग गई थी । सभी विद्यार्थी खाने के लिए एक कतार में बैठ रहे थे। मंगला कतार के सबसे आख़िर में जाकर बैठ गया। रसोइया दिलीप ने एक एक कर सबको पहले पत्तल बांटा फ़िर भात। भात कोई कम दाम के चावल का था जिसमें काले काले दाने थे। रात में घर पर नमक रोटी खाने का सोचकर मंगला ने अधिक भात लिया ताकि रात का बदला अभी ही खा ले।गरीबी कभी कभी आदमी को पेटू भी बना देती है। मंगला को स्कूल में सभी पेटू पेटू कहकर ही चिढ़ाया करते हैं। भात परोसने के बाद दिलीप ने सभी विद्यार्थियों को रस और एक एक अंडा भी परोस दिया। तभी कहीं से सुमन आ धमका और मंगला के पास आकर बैठ गया।
सुमन को देखकर दिलीप ने कहा - तुम तो आज स्कूल नहीं आया था फ़िर खाने के लिए क्यों आ गया?
घर पर माँ ने आज खाना नहीं बनाया था इसलिए स्कूल ही चले आए खाने!
लेकिन अंडा तो हाज़िरी के हिसाब से बनता है न बालक! दिलीप को लगा जैसे सुमन उसके हिस्से का अंडा खाने पहुंचा हो।
कोई बात नहीं। आप मुझे सिर्फ़ भात और रस दे दीजिए - सुमन ने दिलीप की चिंता को दूर करते हुए कहा।


मंगला के पत्तल के बगल में अब भात और रस का एक पत्तल लग चुका था। सुमन ने मंगला की तरफ़ देखा। मंगला समझ गया कि वो पांच रुपया मांग रहा है। कल मैं तुम्हारे पांच रुपए ज़रूर लौटा दूंगा।आज पप्पा घर पर नहीं थे वरना मैं आज ही तुम्हें लौटा देता। मंगला ने पूरे विश्वास के साथ झूठ कहा। सुमन ने गुस्से में कहा - जब औकात नहीं रहे लौटाने का तब उधार मत लिया करो!
मुझे माफ़ कर दो भाई। मैं कल पक्का तुम्हें पांच रुपए लौटा दूंगा - इस बार मंगला ने विनती करते हुए कहा था।
सुमन ने कुछ सोचा फ़िर कहा - ठीक है, चल तुझे माफ़ किया और तुझसे अब पांच रुपए भी नहीं लूंगा। लेकिन तुझे अपना अंडा मुझे देना होगा। एक अंडा का दाम भी पांच रुपया ही है। हिसाब बराबर।
मंगला ने ना चाहते हुए अपना अंडा सुमन के प्लेट में रख दिया और मुस्कुराया। इस बार पानी मंगला के मुंह में नहीं आंख में उतर आया था। मंगला नज़रे झुकाकर अब रस भात खा रहा था।

समाप्त ।

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