मुन्ना

Dr Gauri Srivastava
यंग एडल्ट फिक्शन
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नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर अचानक ही ट्रैन रूकती है। मधु अपनी घडी पर नज़र डालती है, सुबह के नौ बज के पाँच मिनट हुए थे। सभी यात्री जल्दी जल्दी अपने डिब्बे से उतरने लगे। मधु जो कि बरेली से थी और दीपावली की छुट्टियाँ मनाने के बाद वापस अपनी कर्मभूमि पुणे लौट रही थी। अगली ट्रैन पुणे के लिये ग्यारह बज के दस मिनट पर थी इसलिये वह अन्य यात्रियों की तरह उतरने की जल्दी में नहीं थी। वह अपना समान दरवाज़े के पास लगाने लगी। वह थोड़ी देर से ट्रैन से उतरी थी और यह आखिरी प्लेटफार्म था जहाँ अधिकतर पैसेंजर ट्रैन ही रूकती थी इसलिये वहाँ कोई कुली नहीं था।

मधु स्वयं ही अपना समान उतारने लगी। दुबले पतले और सामान्य कद की मधु इतना भारी सामान उतारने में खुद को असमर्थ पा रही थी। तभी उसे उसके पीछे से एक भारी सा स्वर सुनाई दिया "लाओ दीदी मैं उतार देती हूँ!" मधु ने सहसा ही पीछे मुड़ कर देखा। एक टिपटॉप सी दिखने वाली लड़की जिसने कि बहुत गाढ़ा सा मेकअप कर रखा था, उसके पीछे आग्रहपूर्वक हाथ बढ़ाये हुये खड़ी थी। मधु ने देखा कि वह सामान्य महिलाओं से काफी लम्बी थी और उसने स्लिट वाला स्कर्ट और नीचे गले वाला टॉप पहन रखा था। मधु को उसका सुबह सुबह ही इतना गहरा मेकअप देख कर थोड़ा अचरज तो ज़रूर हुआ पर फिर उसने सोचा कि लोगों की अपनी अपनी आदत होती है। मधु ने एक बार फिर पलट कर उस लड़की के चेहरे को देखा तो उसकी ठोड़ी थोड़ी मर्दाना लगी और उसके मुँह से निकल गया "अरे मुन्ना तुम!"

वह लड़की मधु के हाथ से सामान ले कर किनारे बेंच पर रखते हुए बोली "आखिर दीदी आपने पहचान ही लिया।"

फिर वह कुछ रुक कर बोली "मेरा नाम अब मुन्ना नहीं मधुबाला है।"

वह तेज़ी से अपनी उँगलियों से झटके देते हुए अपने मंझोले बालों को सही कर रही थी। उसके बाल काफी आकर्षक तरीके से कटे हुए थे जिनमें ब्लीच की हाइलाइट्स भी दी हुयी थी।

मधु बोली "चलो मधुबाला हम चाय की स्टाल पर चल कर बैठते हैं और वहीँ आराम से बातचीत करेंगे। तुमको जल्दी तो नहीं है ना?"

मधुबाला ने कहा "मेरी ट्रैन भी लेट है। चलिए आराम से ही बातचीत करते हैं।"

चाय की स्टाल पर, चाय की चुस्की लेते हुये दोनों बातें करने लगे।

मधु "तो मुन्ना यह सब कैसे? मुन्ना से मधुबाला?"

मुन्ना "दीदी अब मेरा नाम मधुबाला ही है मुझे इसी नाम से याद रखिये। सारी दुनिया मुझे अब इसी नाम से जानती है और मैं अब एक मेकअप आर्टिस्ट हूँ।"

मधु -"अरे बाबा इतने समय बाद देख रही हूँ कुछ समय तो लगेगा ना! वैसे मैं देख रही हूँ कि तुम्हारी ड्रेस और मेकअप दोनों बहुत अच्छे हैं। कितने छोटे से तुम जब तुमको आखिरी बार देखा था।"

मधु पुरानी यादों में डूब गयी। बरेली में उसके पैतृक घर में मुन्ना की माँ साफ़ सफाई के लिये आती थी। उसी के साथ साथ मुन्ना भी आता था। वह बाकी बच्चों से काफी अलग था। वह बाकि बच्चों जैसा पैंट शर्ट नहीं बल्कि लड़को वाला कुरता पजामा पहनता था और मौका मिलने पर अपनी माँ का दुपट्टा पहन कर उछलता कूदता रहता था। बचपन में तो किसी का उस पर उतना ध्यान नहीं जाता था परन्तु जब वह सोलह सत्रह साल का था तब वह अपनी इन्हीं हरकतों से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने लगा था। परन्तु मुन्ना को इन सब बातों से कोई भी सरोकार नहीं था वह तो बस अपनी छोटी सी दुनिया में मस्त रहता था। कुछ समय बाद मधु को उच्च शिक्षा के लिये अपना शहर छोड़ कर दूसरे शहर जाना पड़ा और बाद में उसे सुनने को मिला कि मुन्ना और उसका परिवार शहर छोड़ कर कहीं और चले गए हैं।

मधु ने पूछा “तुम इतने दिन कहाँ थे? अचानक ही तुम लोग कहाँ चले गये थे?

मुन्ना उर्फ़ मधुबाला चाय पीते हुये नज़रें झुकाये झुकाये ही बोला "दीदी काफी कुछ तो आप समझ ही रही होंगी।"

मधु ने सर हिला कर हामी भरते हुए कहा "हाँ समझ तो मैं काफी समय से रही थी, तुमको बचपन से जो देखा है।“

"दीदी मैंने आपकी नेलपॉलिश चुरा ली थी। आपको याद है ना! मेरी माँ ने जब मेरे नाखूनों में रंग लगा देखा था तो आपके पास पकड़ कर लायी थी। दीदी पर आपने मुझसे कुछ भी नहीं कहा था। कहा कि 'तुमको अच्छी लगी तो तुम ही रख लो नाख़ूनी (नेलपॉलिश)। मुझे हमेशा से ही लड़कियों के कपडे और मेकअप का सामान बहुत अच्छा लगता था। बचपन तक तो सब ठीक ही था पर बड़े होने पर समस्या हो गयी थी। मेरे चेहरे पर बाल के साथ साथ सीने पर उभार भी दिखने लगा था।" मधुबाला ने कुछ सकुचाते हुए बोला।

चाय के गिलास के किनारे पर अपनी उँगली फिराते हुये मुन्ना बोला "मोहल्ले वालों के ताने तो परेशान करते ही थे पर बाद में किन्नरों की टोली मुझे लेने मेरे घर आ पँहुची। हम लोग तो घबरा ही गये। मैं अपनी माँ से दूर नहीं जाना चाहता था क्योंकि मेरे पिताजी भी नहीं हैं। आप जानती ही हैं कि बचपन में सड़क एक्सीडेंट में उनकी जान चली गयी थी।"

मधु कहती है "किन्नरों के तुमको लेने आने से तो बहुत परेशानी हो गयी होगी तुम लोगों को? क्या किया तुम लोगों ने? क्या इसी कारण घर, मोहल्ला, काम सब छोड़ दिया?"

मधुबाला "हाँ दीदी, हमने रातों रात ही घर छोड़ दिया और दिल्ली के लिये निकल लिये।"

मधुबाला मधु की ओर देखता हुआ बोला "दीदी आपने शादी की? वैसे देखने से तो पता नहीं लगता आजकल कि कौन शादीशुदा है और कौन कुँवारा?"

मधु ने इनकार में सर हिलाते हुये कहा "नहीं अभी कहाँ, अभी हाल ही में तो मेरी ट्रेनिंग ख़तम हुयी है।"

मधुबाला कुछ रुक कर बोली "दीदी शुरू में जब हम दिल्ली आये थे तो मुझे एक पार्लर में साफ सफाई करने की नौकरी मिल गयी। वहाँ साल भर तो मैंने सफाई और लड़कियों के पैडीक्योर का काम किया। उसके बाद पार्लर की मालकिन ने मुझे बाकि मेकअप सम्बन्धी सारी बातों की ट्रेनिंग दी। लड़कियों की तरह तैयार होना सिखाया। फैशन की बारीकियाँ बताई और शाम को अंग्रेजी की कोचिंग और नाईट क्लासेस ज्वाइन करवाये। मैंने बारहवीं की परीक्षा पास की।"

मधु "अरे वाह! बहुत अच्छा किया तुमने तो!"

मधुबाला "अभी भी उन्हीं के पास काम करती हूँ। अब मुम्बई की एक कास्मेटिक्स बेचने वाली कंपनी को मॉल में अपने शोरूम को चलाने में किसी की ज़रुरत थी। उन्होंने मुझे बुला लिया है।"

मधु "यह तो अच्छा है। मैं पुणे में हूँ ज़्यादा दूर भी नहीं हूँ तुमसे। मिलने आती रहना।"

मधुबाला "अभी तो मैं दीदी तमिलनाडु में कोवलम जा रही हूँ।"

मधु "क्यों? काम पर नहीं जाना?"

मधुबाला "दीदी मैं शादी करने जा रही हूँ।"

"शादी" मधु ने चौंक कर बोला फिर अपने भाव छिपाते हुये बोली "किस से?"

मधुबाला "दीदी किन्नर समाज भी शादी करता है अपने आराध्य देव इरावान से, सिर्फ एक दिन के लिये।"

"अच्छा!!!" मधु ने उत्सुकता से पूछा।

“हाँ दीदी तमिल लोगों के नये साल पर, तमिलनाडु के कोवलम जिले में, बहुत बड़ा आयोजन होता है। सारा किन्नर समाज वहाँ इकठ्ठा होता है। खूब धूम धाम रहती है।" मधुबाला उत्साह से बताते हुये बोली।

"पर सिर्फ एक दिन की शादी? और यह इरावान नाम के देवता कौन हैं? कभी सुना नहीं इनके बारे में?" मधु ने पूछा।

"दीदी महाभारत में यह अर्जुन के और नागमाता उलूपी के पुत्र थे। इनके बारे में दो कहानियाँ हैं। पहली कि यह महाभारत के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुये और दूसरी कहानी यह कि महाभारत युद्ध से पहले काली पूजन हुआ था जिसमे किसी की को स्वेच्छा से अपनी बलि देनी थी। इसके लिये इरावान ने अपने आप को प्रस्तुत किया और बोले कि वह अपनी इच्छा से अपने जीवन की बलि देने को तैयार हैं परन्तु उनकी शर्त है कि वह कुँवारे नहीं मरना चाहते। इतने कम समय में सिर्फ एक दिन के लिये कोई भी राजकन्या उन से विवाह को नहीं मिल पायी। तब कृष्ण भगवान् ने मोहिनी का रूप धरा और इरावन से विवाह किया और अगले दिन जब इरावान की बलि दे दी गयी तो उन्होंने एक विधवा के भाँति विलाप भी किया। तभी से यह प्रथा चली आ रही है।" मधुबाला से बताया।

वह फिर आगे बोली "चूँकि भगवान् कृष्ण पुरुष थे और उन्होंने स्त्री रूप धारण कर शादी की तो हम किन्नर भी उसी परम्परा का निर्वाह करते हैं और तमिल नव वर्ष पर इरावान के साथ सामूहिक विवाह करते हैं। अगले दिन इरावान की प्रतिमा के साथ जुलूस निकाला जाता है फिर पुजारी उस प्रतिमा को खण्डित कर देता है। उसके बाद हम किन्नरों के गले में बँधा मंगल सूत्र काट दिया जाता है और हम सब विधवा की तरह विलाप करते हैं।"

मधु "कैसा लगता होगा सिर्फ एक दिन की शादी और जीवन भर का वैधव्य?"

मधुबाला "दीदी परम्परायें तो निभानी ही पड़ती हैं और यह सोचिये कि आधी अधूरी ज़िन्दगी में कुछ तो पूर्णता का अनुभव होता है। कटी पतंग सी है हम किन्नरों की ज़िन्दगी, किसी का होना क्या होता है, सम्बन्धित होना क्या होता है हमको पता ही नहीं होता है। इस बहाने कुछ तो स्त्री वाली पूर्णता हमको भी मिलेगी।"

मधु के पास उसकी बातों का कोई भी जवाब नहीं था। उसने बस इतना ही कहा "सही कहा तुमने! बहुत गहरी बात कह दी। काफी अकल आ गयी है तुमको।“

मधुबाला "क्या करें दीदी, समय और परिस्थिति बहुत कुछ सीखा देते है। आपने भी जब घर छोड़ा होगा तब से अब तक काफी बातों का अनुभव किया होगा!"

मधु कुछ सोच कर बोली "तुम्हारी माँ कैसी हैं? सरला काकी को देखे हुये भी ज़माना हो गया है।"

मधुबाला "वह ठीक हैं। वैसे घर पर ही रहती हैं पर घर के पास के एनजीओ में गरीब लड़कियों की एक संस्था चलती है। माई वहीँ लड़कियों को खाना बनाना, अचार., बड़ी, पापड़ वगैरह बनाना सिखाती हैं। उनको अच्छा लगता है यह सब, वरना भगवान् का दिया इतना है कि अब वह आराम से घर पर बिना काम किये रह सकती हैं।"

तभी प्लेटफार्म पर मधु की ट्रैन का अनाउंसमेंट होता है और वह चौंक जाती है।

मधु "तुमसे मिल कर बहुत अच्छा लगा पर अब ट्रैन आ गयी है चलना होगा।"

"मुझे भी बहुत अच्छा लगा दीदी। बरैली तो छूट ही गया है। उस रात जो बरेली वाला घर छोड़ा था, आज तक नहीं लौटे और ना ही किसी से मिले!"

फिर कुछ सोच कर मधुबाला बोली "अपना मोबाइल नम्बर तो दे दीजिये दीदी। आप के पास के शहर में आ रही हूँ, मिलते रहेंगे।"

"हाँ बिलकुल।" यह कह कर मधु अपना मोबाइल नम्बर दे देती है।

"लाइये आपको आपके कम्पार्टमेंट तक पँहुचा दूँ, मेरी ट्रैन भी आती ही होगी। थोड़ा लेट चल रही थी पर अब तो आ जाना चाहिये।“

यह कहते हुये मधुबाला मधु का सूटकेस उठाने लगती है।

मधु "रहने दो। कुली मिल जायेगा अब तो।"

"क्या फर्क पड़ता है? सिर्फ एक ही भारी सूटकेस है बाकि बैग वगैरह तो आपने ही उठा रखे हैं। चलिये इसी बहाने थोड़ी देर का साथ और सही! "मधुबाला कहती है।

मधुबाला ट्रैन तक मधु को छोड़ती है और थोड़ी देर साथ बैठ कर जब ट्रैन चलने का अनाउंसमेंट होता है तो ट्रैन से उतर कर बाहर मधु के पास की खिड़की पर कड़ी हो जाती है। जैसे ही ट्रैन का ले कर चलने को होती है तो मधुबाला सहसा ही कहती है "दीदी मुझे आप बचपन से ही बहुत अच्छी लगती थी। आपने हमेशा मुझ से अच्छा व्यवहार किया इसीलिये मैंने अपना नया नाम आपके नाम पर ही रखा है।"

मधु मुस्कुरा देती है और कहती है "यह नाम तुम पर ज़्यादा जँचता है।"

"ठीक है दीदी। जल्दी ही मुलाक़ात होगी अपना ख्याल रखियेगा। आप भी परिवार से दूर अकेले ही हैं।" मधुबाला ने कहा।

इसी के साथ ट्रैन ने खिसकना शुरू कर दिया था और देखते ही देखते ट्रैन ने गति पकड़ ली और मुन्ना पीछे छूट गया। जब तक वह दिखता रहा, वह उसे बराबर हाथ हिलाती रही।

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