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"It was a wonderful experience interacting with you and appreciate the way you have planned and executed the whole publication process within the agreed timelines.”
Subrat SaurabhAuthor of Kuch Woh Palअपने ही बुने एकान्त में एक ऐसे मनुष्य की काव्य-यात्रा है जो भीड़, शोर और दिखावों के बीच खड़े होकर अपने भीतर एक गहरा एकान्त बुनता है। यह एकान्त न तो पलायन है, न ही अकेलेपन की शिकायत—बल्कि आत्मसंवाद का वह ज़रूरी क्षण है जहाँ मनुष्य स्वयं से प्रश्न करता है, अपने समय से टकराता है और अपने अनुभवों को शब्द देता है।
इस कविता-संग्रह में प्रेम की कोमलता है, स्मृतियों की टीस है, सामाजिक और राजनीतिक विडंबनाओं की चुप लेकिन तीखी आलोचना है, और समय के साथ बदलते मनुष्य का एक संवेदनशील चित्र भी। कवि यहाँ उपदेश नहीं देता, बल्कि घटनाओं, अनुभूतियों और अंतर्द्वंद्वों को इस तरह रखता है कि पाठक स्वयं अर्थ खोजने को विवश हो जाए।
भाषा सरल है, पर भाव गहरे हैं। ये कविताएँ तात्कालिक प्रभाव से अधिक दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ती हैं—ऐसा प्रभाव जो पढ़ने के बाद भी भीतर गूंजता रहता है। संग्रह उन पाठकों के लिए है जो कविता को केवल सौंदर्य की वस्तु नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और सामाजिक सजगता का माध्यम मानते हैं।
अपने ही बुने एकान्त में पाठक को अपने ही भीतर बुने हुए एकान्त से रूबरू कराता है—जहाँ सवाल हैं, असहज सच्चाइयाँ हैं, और कभी-कभी उत्तर से अधिक मौन की सार्थकता है।
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कुमार आनंद
आनंद कुमार समकालीन हिन्दी कविता के एक संवेदनशील और विचारशील हस्ताक्षर हैं। उनका रचनात्मक संसार व्यक्ति और समाज के बीच मौजूद सूक्ष्म तनावों, भीतर पलते प्रश्नों और समय से उपजे आत्मसंघर्षों से आकार लेता है। वे कविता को केवल भावाभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मसंवाद और सामाजिक चेतना का एक ज़रूरी औज़ार मानते हैं।
लेखक की कविताएँ इससे पूर्व विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, जहाँ उनकी रचनात्मक दृष्टि, भाषा की सादगी और भावों की गहराई को सराहा गया है। उनकी कविताओं में प्रेम है, पर वह केवल रोमानी नहीं; उसमें स्मृति, विछोह और यथार्थ की छाया भी है। समाज और राजनीति को लेकर उनकी दृष्टि तीखी होते हुए भी शोर नहीं करती—वह प्रश्न उठाती है, चुपचाप, पर गहरे असर के साथ।
“अपने ही बुने एकान्त में” आनंद कुमार का पहला कविता-संग्रह है। यह संग्रह उस एकान्त की पड़ताल करता है जिसे आधुनिक मनुष्य स्वयं बुनता है—भीड़ के बीच, व्यवस्था के भीतर और अपने ही अनुभवों से। इस एकान्त में निराशा कम और आत्मचिंतन अधिक है; पलायन नहीं, बल्कि ठहरकर देखने का साहस है।
लेखक मानते हैं कि कविता तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि समय के साथ विकसित होने वाली संवेदना है। उनकी रचनाएँ पाठक से त्वरित सहमति नहीं मांगतीं, बल्कि उसे सोचने, रुकने और स्वयं से संवाद करने के लिए आमंत्रित करती हैं।
यह संग्रह उनके अब तक के रचनात्मक सफ़र का पहला औपचारिक पड़ाव है—एक ऐसा आरम्भ, जो आगे की यात्राओं के लिए रास्ता खोलता है।
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