बेटी परिवार की बगियॉं का ऐसा फूल है जिसकी महक समाज तक फैलती है। वह परिवार चहुँ ओर विकास करता है। मॉं, दादी, नानी भी कभी बेटी ही थी। वह मॉं भी धन्य है जो अपनी बेटी को अपने पैरों पर खड़ा कर सक्षम बनाती है। इस नाटक में मॉं के संघर्ष के साथ बेटी भी संघर्ष करती है और कई विभिन्न स्थितियों से मुकाबला कर आगे बढ़ती है। पिता एक नशेड़ी है जो जिन भर कमा कर लाता है और दारू के नशे में उड़ा देता है। मॉं मुश्किलों का सामना कर बेटी को पढ़ाती लिखाती है ।