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Dashnam Goswami Samaj / दशनाम गोस्वामी समाज अद्वैतनिष्ठ स्मार्त संत समाज / Adwaitanishta Smarta Sant Samaj

Author Name: Goswami Vikram Giri | Format: Hardcover | Genre : Religion & Spirituality | Other Details

आधुनिकता की चकाचौंध और पश्चिमी प्रभावों के प्रबल प्रवाह में दशनाम गोस्वामी समाज की गौरवशाली परंपराएँ धुंधली पड़ती प्रतीत हो रही हैं। यह केवल समय का परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक अस्मिता और आध्यात्मिक चेतना के लिए गंभीर संकेत है। यदि जड़ों से संबंध टूट जाए, तो वटवृक्ष की छाया भी टिक नहीं पाती। इसी संवेदना और उत्तरदायित्व-बोध से प्रेरित यह ग्रंथ रचा गया है। यह पुस्तक केवल अतीत की घटनाओं का वर्णन नहीं करती। इसका उद्देश्य युवा पीढ़ी को उनके गौरवशाली इतिहास और महान परंपराओं से परिचित कराना है। यह उन्हें उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकार, शास्त्रों पर आधारित जीवन-मूल्यों और गुरु-शिष्य परंपरा की गरिमा को समझने के लिए प्रेरित करती है। साथ ही, यह अद्वैत की उज्ज्वल जीवन-दृष्टि से उन्हें पुनः जोड़ने का प्रयास है, ताकि वे अपने समाज और संस्कृति पर गर्व महसूस करें। यह कृति एक आह्वान है अपने मूल की ओर लौटने का, अपने कर्तव्य को पहचानने का, और उस तेजस्वी सांस्कृतिक ज्योति को पुनः प्रज्वलित करने का, जिसने सदियों तक धर्म और ज्ञान को आलोकित किया। विश्वास है, यह पुस्तक नई पीढ़ी में स्वाभिमान, समर्पण और जागरण की प्रखर चेतना जगाएगी।

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Hardcover

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vikram giri

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“दशनाम गोस्वामी समाज” गौरवशाली परंपरा, इतिहास, आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक योगदान का प्रेरक व शोधपूर्ण ग्रंथ है—हर जागरूक पाठक के लिए अवश्य

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गोस्वामी विक्रम गिरि

नर्मदा-तट की पावनता में संस्कारित, नर्मदापुरम् की आध्यात्मिक-वसुंधरा में अवतरिता श्रीमती गोस्वामी ज्योति गिरी साधना, सेवा और संस्कार की त्रिवेणी हैं। उनका जीवन समर्पणमय, हृदय करुणामूल, और चेतना लोकमंगलाभिमुख है। बाल्यकाल से ही उनमें तेजस्विता, संवेदनशीलता और कर्मनिष्ठा का ऐसा अखंड प्रवाह रहा कि वे व्यक्तित्व से आगे बढ़कर प्रेरणास्रोत बन गईं।

तीर्थराज पुष्कर की वंश-दीप्ति और नर्मदापुरम् की लोक-संवेदना ने उनके चिंतन को द्विसंस्कृतिक-सौंदर्य प्रदान किया जहाँ राजस्थानी गौरव की गौरिमा और मध्यप्रदेशीय आत्मीयता का समन्वय स्वाभाविक है। उनके आचार में मर्यादाशीलता, विचार में विस्तारशीलता और जीवन-दृष्टि में आध्यात्मिक-उत्तरदायित्व की संतुलित छटा विद्यमान है।

गोस्वामी विक्रम गिरी के साथ परिणय उनका केवल गृहस्थ-संयोग नहीं, अपितु समाज-दीक्षा सिद्ध हुआ। दशनाम गोस्वामी परंपरा से तादात्म्य ने उनके जीवन को परिवार-सीमा से उठाकर समाज-साधना का विस्तृत आयाम प्रदान किया। उनके लिए परिवार संस्कारभूमि है और समाज सेवाक्षेत्र।

नारी-सशक्तिकरण, शिक्षा और सांस्कृतिक जागरण में उनका योगदान केवल सक्रियता नहीं, बल्कि संकल्पसाधना है। वे परिवर्तन की मात्र वाहिका नहीं, अपितु चेतनाशक्ति हैं। उनका व्यक्तित्व मौनकर्म, दृढ़ आस्था और अखंड समर्पण की सजीव प्रतिमा है; उनका समस्त जीवन लोकहित को समर्पित एक अनवरत अर्पण है।

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