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Kathgodam Ki Garmiyan - 2 / काठगोदाम की गर्मियाँ - 2 जब यादें पहाड़ों से भी गहरी हो गई…

Author Name: DHIRENDRA SINGH BISHT | Format: Hardcover | Genre : Poetry | Other Details

काठगोदाम की गर्मियाँ – 2 केवल कविताओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह स्मृतियों, संवेदनाओं और रिश्तों की उन गहराइयों का दस्तावेज़ है जिन्हें शब्दों में बाँध पाना आसान नहीं। लेखक धीरेन्द्र सिंह बिष्ट ‘धीर’ की लेखनी पहाड़ों की सादगी, कस्बों की ख़ामोशी और जीवन की अनकही कहानियों को जीवंत कर देती है।

इस संग्रह की कविताएँ कभी प्रेम की नर्मी को छूती हैं, तो कभी वियोग की तीखी चुभन को उजागर करती हैं। कहीं अकेलेपन की परछाई है, तो कहीं आत्म-खोज की उजली परतें। इसमें पाठक नायक या नायिका नहीं पाएगा, बल्कि अपनी ही भावनाओं से मुलाक़ात करेगा।

हर कविता एक ठहरी हुई चिट्ठी की तरह है—स्याही धुंधली हो सकती है, मगर भावनाएँ ताज़ा रहती हैं। इन पंक्तियों में काठगोदाम की गलियों की गूंज, भीमताल की झील का ठहराव और हल्द्वानी की सुबह की धड़कन हर जगह महसूस होती है।

लेखक की विशिष्टता यह है कि वे कविताएँ नहीं गढ़ते, बल्कि उन्हें जीते हैं। यही कारण है कि पाठक इन रचनाओं को पढ़ते नहीं, बल्कि उनमें खुद को खोजते हैं।
यह पुस्तक उन सभी के लिए है, जो शब्दों के बीच की खामोशी को महसूस करना जानते हैं और जो कविताओं में अपने बीते हुए लम्हों की झलक ढूँढते हैं।

“काठगोदाम की गर्मियाँ – 2” आत्मीयता और संवेदनशीलता का ऐसा संग्रह है, जो आपको न केवल पढ़ने बल्कि भीतर तक महसूस करने के लिए आमंत्रित करता है।

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लेखक: धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

धीरेन्द्र सिंह बिष्ट ‘धीर’ समकालीन हिंदी साहित्य के उन रचनाकारों में हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से जीवन के सबसे गहरे और अनकहे पहलुओं को स्वर दिया है। उत्तराखंड की वादियों से आने वाले धीर की रचनाओं में पहाड़ों की सादगी, कस्बों की ख़ामोशी और मानवीय रिश्तों की सच्चाई सहज ही झलकती है।

उनकी साहित्यिक यात्रा प्रेरणात्मक लेखन से शुरू हुई, जहाँ उनकी पुस्तक “मन की हार, ज़िंदगी की जीत” ने पाठकों को जीवन के संघर्षों में आत्मबल खोजने का मार्ग दिखाया। इसके बाद उनकी कृति “अग्निपथ” ने युवाओं और समाज के बीच संवाद का पुल बनाया।

धीरेन्द्र की विशिष्ट पहचान उनके कथात्मक और काव्य-संग्रहों से बनी। “फोकटिया” जैसे उपन्यास ने उन साधारण दिखने वाले किरदारों को सामने लाया जिन्हें समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। वहीं उनकी चर्चित श्रृंखला “काठगोदाम की गर्मियाँ” ने प्रेम, स्मृतियों, अकेलेपन और आत्म-दर्शन की परतों को बेहद आत्मीयता से उजागर किया।

उनकी रचनाओं में न तो कृत्रिम अलंकरण है और न ही जटिल भाषा—बल्कि वे जीवन की सरल परंतु गहन सच्चाइयों को सहज शब्दों में प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि उनके पाठक उनकी पंक्तियों में अपनी ही भावनाओं की झलक पा लेते हैं।

धीर की लेखनी का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि वे केवल कविताएँ या कहानियाँ नहीं लिखते, बल्कि पाठकों को उनके अपने जीवन के आईने से रूबरू कराते हैं। वे कहते हैं —
“मैं लिखता नहीं, बस वो सब सुनाता हूँ जो कभी किसी ने किसी से कहा नहीं।”

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