कोरोना महामारी से निपटने में जिस प्रकार विभिन्न देशों की आर्थिक प्रणालियां असफल हुईं उससे यह स्पष्ट हो गया है कि, सभी प्रणालियों में स्वार्थ तत्व हावी है और लोगों में अनुशासन कम हो रहा है। यह पुस्तक कोरोना वायरस की महामारी के अर्थव्यवस्थाओं पर प्रभाव में गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। यह पुस्तक वर्तमान आर्थिक स्थिति के परिणामस्वरूप, दुनिया भर में व्यक्तिगत, सामाजिक, व्यवहारिक और व्यवहारगत परिवर्तनों को उजागर करने का एक प्रयास है। कोरोना महामारी से जो समस्याएं और सवाल उठ रहे हैं उनका उत्तर वर्तमान आर्थिक प्रणाली से मिलना मुश्किल है क्योंकि वर्तमान व्यवस्था तो एक दूसरे का शोषण कर अपना हिस्सा बढाने की मानसिकता पर ही टिकी है। इसलिए इसका समाधान ढूंढने के लिए एक नई आर्थिक प्रणाली की कल्पना करनी होगी। एक ऐसी आर्थिक प्रणाली जो उन लोगों के द्वारा दिशा प्राप्त करेगी और संचालित होगी जो वर्तमान आर्थिक प्रणाली के असली चेहरे से भलीभांति परिचित हैं और बदलाव के लिए बेताब हैं। यह पुस्तक "परमार्थ के साथ व्यवसाय" की महत्ता को रेखांकित करते हुए भारतवाद के रूप में एक ने आर्थिक मॉडल की सम्भावना पर प्रकाश डालती है।
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