महाप्रभु श्री जगन्नाथ अखिल ब्रम्हांड के नायक हैं एवं उनसे ही पूरा जगत सतत गतिमान है। यह पुस्तक भी उनकी ही प्रेरणा से लिखने का प्रयास किये हैं। छत्तीसगढ़ राज्य उड़ीसा सीमा से लगा हुआ राज्य है एवं यहाँ के सीमावर्ती जिलों के प्रत्येक शहरों और गांवों में एक श्री जगन्नाथ मंदिर अवश्य हैं। वहां के सभी लोग महाप्रभु श्री जगन्नाथ को ही अपना ईष्ट मानते हैं और पूजन करते हैं अतः उन्हें महाप्रभु एवं उनके श्री महाप्रसाद के बारे में अधिक से अधिक जानने की जिज्ञासा होती है,जबकि इनसे संबंधित अधिकतर साहित्य उड़िया भाषा में ही उपलब्ध है।अतः उनकी जिज्ञासा होने पर भी वे महाप्रभु एवं उनके श्री महाप्रसाद के महत्वों से अनभिज्ञ हैं। आज विश्व के विभिन्न देशों में सनातन धर्म एवं श्री जगन्नाथ संस्कृति का महत्व बढ़ रहा है अतः यह पुस्तक विश्व के उन सभी के लिए भी बहुत उपयोगी है जिनकी महाप्रभु श्री जगन्नाथ एवं श्री जगन्नाथ संस्कृति के प्रति गहरी श्रद्धा एवं विश्वास है। इस पुस्तक में पुरी श्री मंदिर के नीति- विधि एवं श्री महाप्रसाद के निर्माण की विधियाँ तथा उन्हें ग्रहण करने की नीतियों, के बारे में विस्तार से वर्णन है, क्योंकि यह सामान्य प्रसाद नहीं 'महाप्रसाद' है ।
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