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Pratishruti / प्रतिश्रुति अपने अपने किस्से, अपने अपने हिस्से

Author Name: Ravindra Prabhat | Format: Paperback | Genre : Young Adult Fiction | Other Details

शरणार्थी समस्या किसी देश लिए आबादी आक्रमण के समान है, जिसमें लोग हथियारों के बजाय आंसू लेकर आते है।  आज भारत समेत पूरा विश्व शरणार्थी संकट से जूझ रहा है, इस कड़ी में सीरिया, बांग्लादेश, इराक, अफगानिस्तान और म्यांमार बड़े शरणार्थी निर्यातक देश तो भारत, कनाडा, जर्मनी समेत यूरोप के बड़े भूभाग के कई देश शरणार्थी आयातक बनते जा रहे है। वहुचर्चित लेखक रवीन्द्र प्रभात ने इस उपन्यास में इन समस्याओं को विस्तार से उल्लिखित करते हुए यह दर्शाने की कोशिश की है कि पलायन और विस्थापन की पीड़ा कितनी हृदय विदारक होती है। लेखक का मानना है कि  इसका दर्द वही समझ सकता है, जो अपने घर से बेघर होता है। यह पुस्तक लेखक के पूर्व प्रकाशित बहुचर्चित उपन्यास ‘‘कश्मीर 370 किलोमीटर‘‘ का अगला भाग है। जिन साथियों ने पूर्व में प्रकाशित उस उपन्यास को पढ़ा है, उनके लिए निश्चित रूप से इस उपन्यास में अगली कड़ी जोड़ते हुए पढ़ने का अपना एक अलग आनंद होगा और जिन साथियों ने पूर्व में प्रकाशित उस उपन्यास को नहीं पढ़ा है, उन्हें भी इसे पढ़ते हुए किसी अधूरेपन का एहसास नहीं होगा। इस उपन्यास को लिखते हुए लेखक के द्वारा इन बातों का विशेष ध्यान रखा गया है। 

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रवीन्द्र प्रभात

रवीन्द्र प्रभात हिन्दी के मुख्य ब्लॉग विश्लेषक और सोशल मीडिया एक्सपर्ट हैं। इनकी हिन्दी साहित्य में सार्थक उपस्थिति के रूप में अनेकानेक उपलब्धियां हैं। इनके एक काव्य संग्रह ‘‘स्मृति शेष‘‘, दो गजल संग्रह क्रमशः ‘‘हमसफर‘‘ एवं ‘‘मत रोना रमजानी चाचा‘‘, छः उपन्यास क्रमशः ‘‘ताकि बचा रहे लोकतन्त्र‘‘, ‘‘प्रेम न हाट बिकाए‘‘, ‘‘धरती पकड़ निर्दलीय‘‘, ‘‘लखनऊआ कक्का‘‘, ‘‘कश्मीर 370 किलोमीटर‘‘ और ‘‘धरतीपुत्री सीता‘‘ है। चार संपादित पुस्तक क्रमशः ‘‘समकालीन नेपाली साहित्य‘‘, ‘‘हिन्दी ब्लॉगिंगः अभिव्यक्ति की नई क्रान्ति‘‘, ‘‘हिन्दी भाषा के विविध आयाम‘‘ और ‘‘मिथिलेश दीक्षित का व्यक्तित्व, सृजन और प्रदेय‘‘ तथा एक हिन्दी ब्लॉगिंग पर आधारित आलोचना की पुस्तक ‘‘हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास‘‘ प्रकाशित है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित डॉ॰ सियाराम की शोध पुस्तक ‘‘रवीन्द्र प्रभात की परिकल्पना और ब्लॉग आलोचना कर्म‘‘ अभी हाल ही प्रकाशित हुआ है। लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक ‘‘जनसंदेश टाईम्स‘‘ और ‘‘डेली न्यूज एक्टिविस्ट‘‘ के नियमित स्तंभकार रह चुके हैं,  उनके व्यंग्य पर आधारित साप्ताहिक स्तंभ  ‘‘चैबे जी की चैपाल‘‘ काफी लोकप्रिय रहा है। हिन्दी ब्लॉग आलोचना का सूत्रपात करने वाले तथा हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास लिखने वाले वे पहले इतिहासकार हैं। वे ब्लॉग साहित्यिक पुरस्कार ‘‘परिकल्पना सम्मान‘‘ के संस्थापक तथा मासिक पत्रिका ‘‘परिकल्पना समय‘‘ के प्रधान संपादक हैं।

संपर्कः प्रधान संपादकः परिकल्पना समय (हिन्दी मासिक), एस॰ एस॰ 107, सेक्टर-एन-1, संगम होटल के पीछे, अलीगंज, लखनऊ-226024 (उ.प्र.)। 

मोबाइल नंबरः 09415272608 तथा 6307607007 
ईमेल -ravindra.prabhat@gmail.com 

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