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Shankar Sanyas / शंकर-सन्यास जगद्गुरू शंकराचार्य / Jagadguru Shankaracharya

Author Name: Janardan Rai Nagar | Format: Paperback | Genre : Religion & Spirituality | Other Details

‘‘जगद्गुरू शंकराचार्य’’ शंकर के जीवन वृत्त को आधार बनाकर लिखा गया पण्डित जनार्दन राय नागर के इस उपन्यास  का नाम ‘‘शंकर-सन्यास’’ है। बाल्यावस्था से ही अपने चमत्कारों के कारण शंकर जन चर्चाओं का केन्द्र बिन्दु बना। अलवई नदी में स्नान करते समय शंकर का पांव मकर की दाढ़ों में जा फंसा और आसन्न मृत्यु के साक्षात्कार से शंकर की विकलता ने मां विशिष्टा के मन को विचलित कर दिया। ‘‘त्रिवांकुर मण्डल के स्वामी राजशेखर के अनुरोध से शंकर को सन्यास की अनुमति न देने के लिए विशिष्टा का अटल निश्चय डगमगाया। परिस्थिति की गम्भीरता के आवेश में विशिष्टा ने अपने पुत्र शंकर को सन्यास के लिए अन्ततः स्वीकृति दे ही दी।’’

‘चिदानन्द रूपम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्’ का मन्त्र जाप करते हुए सन्यासी रूप में शंकर गुरू गोविन्दपाद से दीक्षा प्राप्त  करने के लिए नर्मदा नदी पर स्थित उनके आश्रम की ओर चल पड़े।  इसके आगे का वृत्तान्त ‘शंकर-दीक्षा’ नामक उपन्यास में दिया गया है।

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जनार्दन राय नागर

पं. जनार्दन राय नागर का जन्म उदयपुर में 16 जून, 1911 ई. को हुआ। बहुआयामी प्रतिभा के धनी पं. नागर ने शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता, राजनीति व समाज सेवा आदि क्षेत्रों में अपनी अमिट कीर्ति स्थापित की। गाँधीवादी संस्कारों से दीक्षित व कथा सम्राट प्रेमचन्द्र के आशीष पात्र रहे जनार्दन राय नागर ने मेवाड़ में शिक्षा के प्रसार के उद्देश्य से 1937 में हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना रात्रिकालीन संस्थान के रूप में की। पं. नागर की सतत तपस्या के परिणाम स्वरूप इस संस्था की  उत्तरोत्तर प्रगति हुई वर्तमान में जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर रूपी वटवृक्ष के रूप में स्थापित है। 

शिक्षा की लोक साधना में लीन जनार्दनराय नागर की ऐकान्तिक साधना साहित्य-सृजन के रूप में निरन्तर गतिमान रही। उन्होंने उपन्यास, कहानी, गद्य-गीत, जीवन चरित्र व काव्य विधाओं में लेखन किया। उनके द्वारा रचित ‘जगद्गुरू शंकराचार्य’ जो कि 5,500 पृष्ठों में समाहित  दस उपन्यासों की श्रृंखला है, चार हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। उनके ‘राम-राज्य’  के पांच उपन्यास प्रकाशित हो चुके है। चार गद्य-गीत संग्रह, नागर की कहानियां शीर्षक से दो कथा संग्रह प्रकाशित हुए हैं। उनके नाटक ‘आचार्य चाणक्य’, पतित का स्वर्ग’, ‘उदा हत्यारा’, ‘जीवन का सत्य’, अत्यन्त चर्चित रहे तथा मंचित भी हुए।

राजस्थान साहित्य अकादमी के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने राज्य में साहित्यिक उन्नयन व मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह की। वे केन्द्रीय साहित्य अकादमी, हिन्दी सलाहकार समिति (रेल्वे), केन्द्रीय प्रौढ़ शिक्षा सलाहकार समिति आदि के मनोनीत सदस्य रहे। विधानसभा में मावली क्षेत्र से विधायक रहे। उन्हें ‘नेहरू साक्षरता पुरस्कार’ व ‘महाराणा मेवाड़ फाउण्डेशन पुरस्कार’ सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए। इस यशस्वी व्यक्तित्व का 15 अगस्त, 1997 को उदयपुर में निधन हुआ।

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