हम आपको यह बता दे उधार उपन्यास पूर्ण रूप से कल्पना पर आधारित है।
इस उपन्यास में सारे पात्र काल्पनिक है।
इनका जीवित या मृत व्यक्ति से किसी भी प्रकार का कोई लेना देना नहीं है
जैसा कि सब जानते है। जीवन के दो पहलू है, नकद और उधार।
कहा तो यह भी जाता है। नकद वाले डिस्को, उधार वाले खिसको।
आजकल किसी को उधार देना एक गुनाह साबित हो रहा।
उधार मांगते समय उधार लेने वाला रोता है।
लेकिन उधारी का अपना पैसा मांगते हुए, उधार देने वाला रोता है।
क्या यह बाते जीवन में सटीक बैठती है?
क्या आप भी कभी जीवन में पैसा उधार लेने या देने की स्थिति में आए हैं?
यदि हां, यदि ना, तो जानने के लिए पढ़िए उधार उपन्यास।
जो सिर्फ और सिर्फ उधार मांगने और लेने वालो के हालत, परिस्थितियो और चरित्र को उजागर करता है।
लेखक मान सिंह नेगी
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