ये क़िताब मेरे गुज़रे वक्त के वो दस्तावेज़ हैं, जिन्हें मैंने ताउम्र महफूज़ रखने की ज़हमत उठाई है। "अहद -ए- इश्क़" मेरे इश्क की वो गैर मुकम्मल दास्तां है जहां नाकामिल इश्क़ , उसकी खूबसूरती और मलाल को एक लिखित चेहरा दिया गया है। श्रोताओं से मुझे ये उम्मीद है कि शायद ज़रिए इस किताब के , मैं उनके अधूरे फ़रियाद को एक कामिल चेहरा दे सकूं।