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Subrat SaurabhAuthor of Kuch Woh Palभाषा का यह स्वभाव होता है कि वह अपने बहुत से शब्दों को युगानुरूप बदलती चलती है और फिर वही अर्थ रूढ़ हो जाता है – ऐसा अंग्रेज़ी के साथ भी हुआ, हिन्दी के साथ भी और उर्दू के साथ भी। किन्तु जब कोई शब्द धर्म की किसी उदात्त भावना का बोधक एवं प्रतीक हो और नए सामाजिक परिवेश में अपना मूल अर्थ खो कर विपरीत अर्थ में रूढ़ होने लगे, तब उसके मूल अर्थ की पुनर्प्रतिष्ठा आवश्यक हो जाती है। यह कार्य किसी समाज-सुधारक का हो न हो पर ‘क़लम के सिपाही’ का अवश्य होता है, क्योंकि वह कथा में ढाल कर अपनी बात सीधे पाठक के हृदय तक पहुंचा देता है। ‘जिहाद’ ऐसा ही एक शब्द है – मूल अर्थ सत्य के लिए असत्य के विरुद्ध संघर्ष, किन्तु दुर्भाग्य से यह आतंकवाद का पर्याय बन गया है – जिसका परिणाम घृणा, हिंसा, प्रतिहिंसा है। अतः ऐसे वातावरण में याक़ूब यावर का यह उपन्यास साहित्य क्षेत्र में वही कार्य करेगा जो रिसते घावों पर शीतल लेप करता है। जिहाद के मूल अर्थ की स्थापना के साथ साथ यह उपन्यास यथार्थ के धरातल से उठ कर एक आदर्श की स्थापना भी करता है। बाबरी मस्जिद के शहीद कर दिये जाने के पश्चात निराशा में डूबा युवा मुस्लिम मन किस प्रकार घृणा और प्रतिशोध की सीढ़ियों पर चढ़ कर अंततः राष्ट्र-प्रेम के उदात्त शिखर पर पहुंचता है, संघर्ष इसी तथ्य की सशक्त कथा और सही समय पर आया एक मधुर उपन्यास है, जिसे पढ़ने वाले निश्चय ही एक बार पुनः उस भाईचारे के मार्ग का दर्शन कर सकेंगे जो कभी हम भारतीयों की थाती था।
याक़ूब यावर
विभिन्न सम्मानों से सम्मानित और दर्जनों पुस्तकों के लेखक याक़ूब यावर उर्दू साहित्य के एक सुज्ञात और प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं, जिनकी सृजन-धारा विविध रूपों में सतत प्रवाहित है। काव्य, समालोचनात्मक शोध, प्रसिद्ध नाटककार आग़ा हश्र काश्मीरी के नाटकों का आठ खंडों में सम्पादन, लगभग पंद्रह उपन्यासों और आठ अन्य पुस्तकों का अंग्रेज़ी से उर्दू में अनुवाद, विभिन्न प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित अनगिनत लेखों के अतिरिक्त उपन्यास साहित्य में भी उनकी देन अप्रतिम है। कभी प्राचीन भारतीय इतिहास (दिलमुन, धवलदीप) और कभी इस्लामी मिथक (अज़ाज़ील) को अपना विषय चुनने के बाद डा. यावर ने अब एक अत्यंत संवेदनशील और समसामयिक समस्या ‘जिहाद’ को अपना विषय चुना है। उर्दू के साथ हिन्दी में भी समान अधिकार रखने वाले याक़ूब यावर ने हिन्दी पाठकों के लिए स्वयं दिलमुन का और अब जिहाद का हिन्दी अनुवाद ‘संघर्ष’ के नाम से प्रस्तुत किया है।
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