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Meri ARDDHANGINI, uski Premika / मेरी अर्द्धांगिनी, उसकी प्रेमिका Meri Patni, Uski Premika

Author Name: Rajesh Aanand | Format: Paperback | Genre : Literature & Fiction | Other Details
"संजय क्या तुम यकीन करोगे ? तुम्हारी मॉ को अपने 3 महीने के बच्चे के साथ पूरे दो रातें और तीन दिन इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर गुजारनी पड़ी।" अपनी बात जारी रखते हुए उन्होने कहा – “मैं सारा दिन पागलो सा पैसे और कमरे के इन्तजाम में यहाँ वहाँ भटकता रहा। तीसरे दिन शाम को जाकर मैं तुम दोनो के लिए एक कमरे का इन्तजाम कर पाया। नया कमरा कुछ खास नही था मगर तुम्हारी माँ देर तक भरी भरी आँखों से उन दीवारो को घूरती रही। पता नही क्यों?" "पापा...।" मेरा दिल फट पड़ा। "उस वक्त पहली बार मुझे घर और पैसे की कीमत समझ आयी। इससे पहले मैं पैसे को सिर्फ जीवन गुजारने का साधन ही समझ रहा था लेकिन उस दिन समझ आया कि पैसा साधन नही दरअसल यह खुद अपने आप मे एक जिन्दगी है। और उसके बाद जब मैं पैसे कमाने के लिए घर से निकला तो चलते चलते इतनी दूर चला गया कि वक्त पर लौटना मुस्किल हो गया। तुम्हारी मॉ की चिता को मैं आग भी नही दे पाया। जानते हो न।" संजय, जी हाँ यही नाम है उस किरदार का जिसकी जिंदगी के इर्द गिर्द पूरी कहानी के धागे बने गए हैं। आधुनिक जीवन शैली के पीछे भागते हुए इस किरदार की जिंदगी में ३ लड़कियाँ आयीं। एक वह (प्रिया) जिसे संजय प्यार करता था, दूसरी वह लड़की जिससे (खुशबू) उसने शादी की और तीसरी वह (नीतू ) जिसने संजय को टूट कर चाहा मगर जिंदगी भर कभी उसे पा नहीं सकी। संजय की पत्नी की वेवफाई फिर तलाक, इकलौती बेटी पंखुड़ी की मौत, प्रिया की जिंदगी की त्राश्दी और नीतू का बलिदान इस कहानी को रिश्तो के धागो में ऐसी उलझाती है कि उसमे से कोई भी कभी बाहर नहीं निकल पाया।
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राजेश आनंद

राजेश आनंद का जीवन परिचय शब्दों के धागे से नहीं गढ़ा जा सकता। संवेदनाये उनके बचपन से ही उनके व्यक्तित्व का हिस्सा रही हैं। छोटी छोटी बातों के अभिप्राय को समझना, विश्लेषण करना उन्हें शब्दों और चित्रों के जरिये स्वर देने की चेष्ठा ने उन्हें बाल्य्काल में ही एक परिपक्व लेखक और चित्रकार बना दिया था। उनकी पहली उपन्यास गुनहगार उस समय प्रकशित हुई थी जब उनकी उम्र महज़ 17 साल की थी। लेखन के प्रति आकर्षण उनकी प्रतिभा का नहीं अपितु स्वाभाव का हिस्सा था। अमूनन जिन घटनाओ को दिनचर्या का हिस्सा समझ व्यक्ति भुला देता है उन्ही घटनाओं में वह अपनी कहानियों के क़िरदार ढूढते हैं। अब तक लिखी उपन्यासों जैसे 'गुनहगार' में उन्होंने जहाँ एक ओर एक लड़की के पिता की मजबूरियाँ और इंसान की हैवानियत का जीवंत चित्रण किया है तो 'रागिनी - द स्कूल गर्ल' में उन्होंने 12 -13 की लड़कियों के किरदारों को 21वी शदी के समाज से ऐसा रिश्ता कायम कर दिया है कि समझना मुश्किल हो जाता है कि आप कोई कहानी पढ़ रहे हैं या अपने आस पास हो रही घटनाओं को जीवंत देख रहें हैं। स्कूल की लड़कियों में लड़कों को लेकर उनके मनोभाव, आकर्षण, और असहजता के खूबसूरत चित्रण ने कहानी के जरिये लेखक की भावनाओ पर पकड़ को प्रदर्शित करता हैं। अपनी एक उपन्यास 'ग्लैमरस' में जहाँ उन्होंने प्रेम और शादी के वीभत्स रूप से पाठको को अवगत कराया तो वही अपनी दूसरी उपन्यास 'लाल ग्रह ' से उन्होंने कल्पनाओ की उड़ान को मंगल ग्रह तक लेकर चले गए। उन्होंने पृथ्वी के विखंडन से लेकर विज्ञान की दुनिया में अद्वितीय तरक्की के वावजूद प्रकति के सामने इंसान की लाचारी और दूसरे ग्रह में खुद को बसा कर जिन्दा रखने की जद्दोज़ेहद का बहुत ही खूबसूरत ख़ाका गढ़ा है। लेखक अपनी कल्पनाओ की उड़ान और कलम की धार को यहीं नहीं रोका। उन्होंने 'हिन्दू -द दंगा' उपन्यास जरिये उन्होंने धर्म में विघटित समाज पर कुठाराघात किया है। उन्होंने समझाने की कोशिश की कि एक ब्राह्मण स्त्री मुस्लिम पुरुष से शादी करने के बाद कैसे एक कलंकित वस्तु में तब्दील हो जाती है जिसे न हिन्दू रखना चाहता है न मुसलमान।
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