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Satya darshanika darshan aur karma vedanta vikas darshana / सत्य दार्शनिक-दर्शन और कर्म वेदान्त-विकास दर्शन

Author Name: Lava Kush Singh "vishwmanav" | Format: Paperback | Genre : Educational & Professional | Other Details

विषय- सूची

भाग-1 : दर्शन और दार्शनिक 
”दर्शन“ शब्द का अर्थ
हिन्दू दर्शन-परम्परा
दर्शनशास्त्र का क्षेत्र

भाग-2 : आस्तिक (ईश्वर कारण है अर्थात ईश्वर को मानना)
1. स्वतन्त्र आधार 
 1. कपिल मुनि - सांख्य दर्शन 
 2. पतंजलि - योग दर्शन 
 3. महर्षि गौतम- न्याय दर्शन 
 4. कणाद- वैशेषिक दर्शन 
2. वैदिक ग्रन्थों पर आधारित
 अ. कर्मकाण्ड पर आधारित
  1. जैमिनि- मीमांसा दर्शन 
  ब. ज्ञानकाण्ड अर्थात उपनिषद् पर आधारित
  1. द्वैताद्वैत वेदांत दर्शन - श्रीमद् निम्बार्काचार्य
  2. अद्वैत वेदांत दर्शन - आदि शंकराचार्य 
  3. विशिष्टाद्वैत वेदांत दर्शन - श्रीमद् रामानुजाचार्य 
  4. द्वैत वेदांत दर्शन - श्रीमद् माध्वाचार्य
  5. शुद्धाद्वैत वेदांत दर्शन - श्रीमद् वल्लभाचार्य

भाग-3 : नास्तिक (ईश्वर कारण नहीं है अर्थात ईश्वर को न मानना)
1. चार्वाक- चार्वाक दर्शन 
2. भगवान महावीर- जैन दर्शन
3. भगवान बुद्ध- बौद्ध दर्शन

भाग-4 : धर्म
धर्म का अर्थ, रिलिजन    
परिभाषा, तत्व चिंतन और आवश्यकता
दर्शन, धर्मदर्शन, विज्ञान, नैतिकता 
वस्तु तत्व एवं प्रतीक 
धर्मसमभाव की अवधारणा और विश्वधर्म का आधार

भाग-5 : कर्म वेदान्त और विकास दर्शन
स्वामी विवेकानन्द की दृष्टि
कर्म वेदान्त और विकास दर्शन
एकात्मकर्मवाद और विश्व का भविष्य
विश्व का मूल मन्त्र- “जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान-जय ज्ञान-जय कर्मज्ञान“

भाग-6 : चौथा युग : कलियुग
लव कुश सिंह “विश्वमानव”
ऋषि और लव कुश सिंह “विश्वमानव” 
बुड्ढा कृष्ण : कृष्ण का भाग-दो और अन्तिम
वैश्विक बुद्ध - बुद्ध का भाग दो और अन्तिम
सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त के अनुसार काल, युग बोध एवं अवतार
“सम्पूर्ण मानक” का विकास भारतीय आध्यात्म-दर्शन का मूल और अन्तिम लक्ष्

 

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Paperback 375

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लव कुश सिंह “विश्वमानव”

कल्कि महाअवतार के रूप में स्वयं को प्रकट करते श्री लव कुश सिंह “विश्वमानव” द्वारा प्रकटीकृत ज्ञान-कर्मज्ञान न तो किसी के मार्गदर्शन से है और न ही शैक्षिक विषय के रूप में उनका विषय रहा है। न तो वे किसी पद पर कभी सेवारत रहे, न ही किसी राजनीतिक-धार्मिक संस्था के सदस्य रहे। एक नागरिक का अपने विश्व-राष्ट्र के प्रति कत्र्तव्य के वे सर्वोच्च उदाहरण हैं। साथ ही राष्ट्रीय बौद्धिक क्षमता के प्रतीक हैं।

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